भारत स्वस्तिक यात्रा पहुंची ओंकारेश्वर, मोरारी बापू ने दिया भावुक संदेश

0
8

ओंकारेश्वर। ‘भारत स्वस्तिक यात्रा’ के तहत ओंकारेश्वर पहुंचे प्रख्यात संत मोरारी बापू ने गुरुवार को रामकथा के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि शारदीय नवरात्रि का यह पर्व शक्ति की उपासना का समय है, किंतु सच्ची आराधना वही है जिसमें समस्त जीवों के प्रति अगाध करुणा और श्रद्धा का भाव समाहित हो। इस दौरान बापू ने धर्म के नाम पर दी जाने वाली पशु बलि को पूरी तरह से बंद करने की पुरजोर अपील की। उन्होंने कहा कि कुछ स्थानों पर आज भी पूजा-अर्चना के नाम पर बेजुबान पशुओं की बलि दी जाती है, जो सर्वथा अनुचित और अमानवीय है। उन्होंने करुणा और दया को ही सनातन धर्म का मूल आधार बताया।

अभिमान से मुक्त होना ही जीवन का सर्वोच्च मार्ग

कथा के दौरान मोरारी बापू ने अहंकार के विभिन्न रूपों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मानव जीवन की सबसे श्रेष्ठ और उत्तम अवस्था 'निरभिमान' की है, यानी अहंकार से पूरी तरह मुक्त हो जाना ही सर्वोपरि है। यदि किसी व्यक्ति के पास कोई विशेष योग्यता, प्रचुर ज्ञान या अपार संपत्ति आ जाए, और इसके कारण उसके स्वभाव में अभिमान या घमंड घर कर ले, तो यह कतई उचित नहीं है। मनुष्य को अपनी उपलब्धियों के बाद भी सदैव विनम्र रहना चाहिए।

ओंकार और स्वस्तिक का गहरा आध्यात्मिक संबंध

भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन करने के उपरांत मोरारी बापू ने कहा कि 'ओंकार' का 'स्वस्तिक' के साथ अत्यंत गहरा और प्रगाढ़ संबंध है, तथा यह पवित्र प्रतीक 'आदि नाद' का द्योतक है। सनातन संस्कृति में ओंकारेश्वर की इस धरा का विशिष्ट और अद्वितीय महत्व है, क्योंकि इस पावन भूमि का संबंध आदि शंकराचार्य और उनके गुरु गोविंद भगवत्पाद की ऐतिहासिक भेंट से जुड़ा हुआ है। जगतगुरु शंकराचार्य की महान आध्यात्मिक यात्रा को सही दिशा प्रदान करने वाली गुरु-शिष्य परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति इसी पवित्र भूमि पर देखने को मिलती है।

तुलजापुर में मां तुलजा भवानी और छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मरण

इस यात्रा के पिछले चरणों का जिक्र करते हुए बापू ने बताया कि बुधवार को महाराष्ट्र के तुलजापुर में आयोजित रामकथा के दौरान उन्होंने स्वस्तिक के चार कोनों के स्वरूप पर प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि स्वस्तिक यज्ञकुंड मंगल और सामूहिक कल्याण का प्रतीक है, जो सभी के कल्याण की भावना का प्रतिनिधित्व करता है। बापू ने मां तुलजा भवानी और छत्रपति शिवाजी महाराज के ऐतिहासिक प्रसंगों को याद करते हुए कहा कि तुलजापुर हमारी सांस्कृतिक चेतना में अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। उन्होंने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के दृढ़ संकल्प तथा मां तुलजा भवानी के दिव्य आशीर्वाद से जुड़ी चिरस्थायी परंपरा को भी नमन किया।

इसके साथ ही, अपनी यात्रा के दौरान कर्नाटक के हंपी में दिए गए संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने गुलजारी लाल नंदा के कार्यकाल का जिक्र किया था और कहा था कि साधु-संतों के आंदोलन के दौरान भी संयम और शांति का मार्ग ही सर्वोपरि रहता है।