ऐतिहासिक धरोहर पर बदमाशों का हाथ साफ, 12 दिन रेकी के बाद वारदात को दिया अंजाम

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शिवपुरी: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित ऐतिहासिक नरवर किला, जो कभी भगवान श्रीराम के ज्येष्ठ पुत्र कुश की प्राचीन राजधानी रहा है और राजा नल-दमयंती की अमर प्रेम कहानियों को अपने सीने में संजोए हुए है, आज प्रशासनिक उदासीनता और इतिहास की खुली लूट का एक मूक गवाह बन गया है। आगामी सावन के ठीक पहले, 15-16 जुलाई की दरमियानी रात को हथियारबंद बदमाशों के एक बड़े गिरोह ने इस अजेय माने जाने वाले किले की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से तार-तार कर दिया। दुस्साहसी चोरों ने इस ऐतिहासिक दुर्ग से 16वीं शताब्दी (सिंधिया काल) की एक अत्यंत दुर्लभ और बेशकीमती तोप चोरी कर ली। इस पूरे मामले में पुलिस जांच में जो सबसे सनसनीखेज खुलासा हुआ है, वह यह है कि चोरों ने इस बड़ी वारदात को अंजाम देने से ठीक 12 दिन पहले ही पूरे घटनाक्रम की बकायदा 'रिहर्सल' कर ली थी, लेकिन पुरातत्व विभाग सोता रहा।

25-30 हथियारबंद डकैतों ने आधी रात को बोला धावा, लाठी के भरोसे थे निहत्थे सुरक्षाकर्मी

  • दहशत में गार्ड: वारदात की रात नरवर किले की सुरक्षा में तैनात एकमात्र सुरक्षाकर्मी बाल किशन की आंखों में अब भी उस खौफनाक रात की दहशत साफ देखी जा सकती है।

  • सुरक्षा के शून्य इंतजाम: उन्होंने पुलिस को बताया, "आधी रात के सन्नाटे में अचानक 25 से 30 अज्ञात लोग किले के पिछले दुर्गम और पथरीले रास्ते से भीतर घुस आए। उन सभी के हाथों में आधुनिक घातक हथियार थे। हमारे पास पूरे किले की रखवाली के लिए और खुद के बचाव के लिए सिर्फ एक साधारण लाठी थी, प्रशासन ने हमें एक टॉर्च तक उपलब्ध नहीं कराई है। बदमाशों ने हमें चारों तरफ से घेर लिया और शोर मचाने पर सीधे जान से मारने की धमकी दी। जान बचाने के लिए हमें चुप रहना पड़ा।"

5 जुलाई को की थी पहली नाकाम कोशिश, 15 जुलाई को पूरी तैयारी के साथ लौटे चोर

पुलिस की प्रारंभिक फॉरेंसिक और क्राइम ब्रांच की जांच में एक चौंकाने वाली कूटनीतिक चूक सामने आई है। यह गिरोह पहली बार 5 जुलाई को किले के भीतर दाखिल हुआ था। उस समय बदमाशों ने किले के ओपन कचहरी परिसर में रखी सिंधिया कालीन 14 भारी तोपों में से एक को उसके ऊंचे स्टैंड से नीचे गिरा दिया था। परंतु, तोप का वजन अत्यधिक होने के कारण वे उसे उस दिन ले जाने में असमर्थ रहे और वहीं छोड़कर भाग गए।

इस नाकामी के बाद, 15-16 जुलाई की रात को वे पूरी प्लानिंग और हैवी लोडिंग वाहनों (ट्रक/पिकअप) के साथ लौटे। उन्होंने भारी-भरकम तोप को आसानी से वाहन में लादा और चंपत हो गए। किले के पिछले पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर मिले टायरों के गहरे निशान इस बात की पुख्ता गवाही दे रहे हैं कि चोरों का यह नेटवर्क कितना मजबूत था।

अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में 2 से 5 करोड़ रुपये है इस एंटीक तोप की कीमत

  • अष्टधातु का अनूठा मिश्रण: 16 जुलाई की सुबह जैसे ही मुख्य केयरटेकर ने नरवर थाने पहुंचकर इस बड़ी चोरी की लिखित शिकायत दर्ज कराई, वैसे ही पुरातत्व महकमे में हड़कंप मच गया। पुरातत्व विशेषज्ञों का कहना है कि चोरी गई यह तोप केवल लोहे का कोई साधारण टुकड़ा नहीं थी। यह पीतल, तांबा, कांसा और बहुमूल्य अष्टधातु के विशेष वैज्ञानिक मिश्रण से तैयार की गई थी। इसके ऊपर फारसी भाषा और देवनागरी लिपि में तत्कालीन शाही राजचिह्न और निर्माण वर्ष बेहद खूबसूरती से उकेरे हुए थे।

  • एंटीक तस्करों का हाथ: विधिक और आधिकारिक तौर पर देश की इस ऐतिहासिक धरोहर की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती, लेकिन अंतरराष्ट्रीय चोर बाजार (एंटीक ब्लैक मार्केट) में 16वीं सदी की ऐसी दुर्लभ तोपों की कीमत 2 से 5 करोड़ रुपये तक आंकी जाती है। लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क के अवैध भूमिगत नीलामी घरों में इन अष्टधातु की तोपों की भारी मांग रहती है। यही मुख्य वजह है कि मध्य प्रदेश पुलिस अब इस मामले को किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय एंटीक तस्कर गिरोह (इंटरनेशनल स्मगलिंग सिंडिकेट) से जोड़कर देख रही है।

14 में से अब केवल 13 तोपें ही बचीं; प्रशासन की घोर लापरवाही पर उठे बड़े सवाल

शिवपुरी: इस दुस्साहसिक वारदात के बाद क्षेत्र के एसडीओपी प्रशांत शर्मा ने मीडिया को बताया कि मामले की गहराई से तकनीकी जांच की जा रही है। पुलिस की एक विशेष टीम नरवर में डेरा डाले हुए है और संदिग्धों से पूछताछ कर रही है। इस घटना में किसी अंतरराज्यीय बड़े गिरोह की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं दूसरी ओर, राज्य पुरातत्व विभाग के डिप्टी डायरेक्टर तरुण कुमार महोबिया ने भी जल्द नरवर किले का आपातकालीन दौरा करने की बात कही है। उन्होंने इस चोरी को राज्य की सांस्कृतिक विरासत पर एक बड़ा हमला बताते हुए कहा कि किले की सुरक्षा का नए सिरे से आकलन किया जाएगा और तोप की जल्द बरामदगी के लिए गृह विभाग के माध्यम से पुलिस पर दबाव बनाया जाएगा।

परंतु, इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है। जो नरवर किला अपने स्वर्णिम इतिहास में कभी बड़े-बड़े मुगलों और दुश्मनों के लिए पूरी तरह 'अजेय' माना जाता था, आज उसी किले की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा गार्ड बिना टॉर्च और बिना किसी आत्मरक्षा के हथियार के ड्यूटी करने को मजबूर हैं। इतिहास की गवाही देतीं 14 तोपों में से अब वहां केवल 13 तोपें ही शेष बची हैं।

जनता और बुद्धिजीवियों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 5 जुलाई को बदमाशों ने पहली बार तोप को गिराकर चोरी का प्रयास किया था, तब स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग ने हाई अलर्ट क्यों जारी नहीं किया? क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को इस गंभीर खतरे की भनक तक नहीं लगी? अगर इस शर्मनाक घटना के बाद भी सरकार की नींद नहीं टूटी, तो वह दिन दूर नहीं जब इस ऐतिहासिक किले की बची-खुची अन्य बहुमूल्य धरोहरें भी एक-एक कर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नीलाम हो जाएंगी।