लीबिया में मध्यस्थता की कोशिश या दलाली? पाकिस्तान पर उठे सवाल

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इस्लामाबाद। वैश्विक कूटनीति के मंच पर एक बेहद चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे पाकिस्तान ने अब उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया के गृहयुद्ध को सुलझाने का बीड़ा उठाया है। कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के पतन के बाद से दो विरोधी गुटों में बंटे लीबिया में शांति स्थापित करने के लिए पाकिस्तान पर्दे के पीछे से बातचीत को आगे बढ़ा रहा है। हालांकि, पाकिस्तान की इस 'शांतिदूत' वाली भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। इस संशय की मुख्य वजह यह है कि दोनों गुटों के बीच मध्यस्थता की इस मेज को सजाने से ऐन पहले, दिसंबर 2025 में पाकिस्तान ने लीबिया के एक बागी सैन्य गुट के साथ 4 अरब डॉलर (करीब 33 हजार करोड़ रुपये) से अधिक के विशाल हथियार सौदे पर दस्तखत किए थे। यह पूरा मामला इसलिए भी विवादों में है क्योंकि साल 2011 से ही संयुक्त राष्ट्र (UN) ने लीबिया पर कड़ा हथियार प्रतिबंध (आर्म्स एम्बारगो) लगा रखा है।

दो फाड़ में बंटा लीबिया और पाकिस्तान का 36 महीनों का 'शांति फॉर्मूला'

लीबिया पिछले कई वर्षों से दो समानांतर सत्ताओं के बीच पिस रहा है। एक तरफ त्रिपोली से चलने वाली संयुक्त राष्ट्र समर्थित पश्चिमी सरकार है, जिसकी कमान प्रधानमंत्री अब्दुलहामिद दबेबाह के हाथों में है। वहीं दूसरी ओर, पूर्वी लीबिया पर ताकतवर सैन्य कमांडर खलीफा हफ्तार का एकछत्र नियंत्रण है। दावों के मुताबिक, इन दोनों विरोधी खेमों ने खुद पाकिस्तान से इस गतिरोध को खत्म करने की अपील की थी। पाकिस्तान ने इसके लिए 36 महीनों का एक विस्तृत राजनीतिक खाका तैयार किया है, जिसके तहत देश में एक नई साझा सरकार का गठन होना है।

इस प्रस्तावित समझौते के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त पश्चिमी सरकार के प्रमुख अब्दुलहामिद दबेबाह ही देश के प्रधानमंत्री बने रहेंगे।

  • पूर्वी लीबिया के मिलिट्री कमांडर खलीफा हफ्तार के बेटे, सद्दाम हफ्तार को 'प्रेसिडेंशियल काउंसिल' का नया चेयरमैन नियुक्त किया जाएगा।

  • चूंकि देश के अधिकांश बड़े तेल कुओं और रणनीतिक ठिकानों पर हफ्तार की सेना का कब्जा है, इसलिए देश के बजट और खजाने की चाबी भी अप्रत्यक्ष रूप से उन्हीं के पास रहेगी।

वाशिंगटन से लेकर रियाद तक, सबको है पाकिस्तान के इस खेल की खबर

हैरानी की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों को दरकिनार कर चल रहे पाकिस्तान के इस बैकस्टेज ड्रामे की पूरी जानकारी महाशक्ति अमेरिका को भी है और वह इसमें परोक्ष रूप से भागीदार है। इसके अतिरिक्त, सऊदी अरब, कतर और तुर्की जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों का भी इस पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया को मौन समर्थन हासिल है। हालांकि, पाकिस्तानी रक्षा अधिकारियों ने प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोपों को सिरे से नकार दिया है। उनका तर्क है कि वे अकेले नहीं हैं, बल्कि दुनिया के कई अन्य देश भी लीबिया के अलग-अलग गुटों को सैन्य और रसद सहायता पहुंचा रहे हैं। इस एंट्री के जरिए इस्लामाबाद न केवल उत्तरी अफ्रीका में अपना रणनीतिक दबदबा बढ़ाना चाहता है, बल्कि खुद को एक बड़े ग्लोबल वेपन सप्लायर के रूप में स्थापित करने की फिराक में भी है।

शांति वार्ता की आड़ में अरबों डॉलर के 'फाइटर जेट' बेचने की दलाली!

इस तथाकथित शांति वार्ता के पीछे छिपे पाकिस्तान के असल आर्थिक और सैन्य हित अब पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं। दिसंबर 2025 में पाकिस्तान ने लीबिया की पूर्वी सेना (हफ्तार गुट) के साथ अपने इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात समझौता (डिफेंस एक्सपोर्ट डील) फाइनल किया था। 4 अरब डॉलर से अधिक की इस गुप्त डील के तहत पाकिस्तान, चीन की मदद से तैयार किए गए 16 घातक जेएफ-17 (JF-17 Block-III) फाइटर जेट और 12 सुपर मुशशाक ट्रेनर विमान पूर्वी लीबिया की सेना को सौंपने जा रहा है। गौरतलब है कि यह अरबों डॉलर का सौदा पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख (आर्मी चीफ) जनरल असीम मुनीर और खलीफा हफ्तार के बेटे सद्दाम हफ्तार की एक बेहद गोपनीय मुलाकात के बाद पक्का हुआ था, जिससे यह साफ हो गया है कि इस शांति समझौते की दलाली के पीछे पाकिस्तान का असल मकसद सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना है।