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अस्पतालों में खत्म हो रहीं दवाएं, कैंसर मरीजों की जान पर संकट; फलस्तीन की भारत से अपील

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नई दिल्ली। भारत में स्थित फिलिस्तीनी दूतावास ने युद्धग्रस्त क्षेत्र में उपजे भयंकर स्वास्थ्य संकट को देखते हुए आपातकालीन स्तर पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से भारत सरकार से तत्काल दखल देने की गुहार लगाई है। दूतावास द्वारा शुक्रवार को जारी एक आधिकारिक वक्तव्य में कहा गया है कि फिलिस्तीनी क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है और चिकित्सा व्यवस्था ठप होने की कगार पर पहुंच चुकी है। बयान के अनुसार, यह विकट स्थिति इजरायल द्वारा जारी सैन्य अभियानों, अस्पतालों की व्यापक तबाही, जीवन रक्षक दवाओं की आपूर्ति पर लगी कड़े प्रतिबंधों और आर्थिक नाकेबंदी का सीधा परिणाम है।

'आरोग्य मैत्री' के तहत मानवीय सहायता और भारत से उम्मीद

फिलिस्तीनी राजनयिक मिशन ने अपने वक्तव्य में भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि हजारों बेकसूर नागरिकों के प्राणों की रक्षा करने का यह अत्यंत निर्णायक समय है। फिलिस्तीन के लोग न्याय और मानवीय संवेदनाओं के लिए भारत की ओर बड़ी उम्मीदों से देख रहे हैं। दूतावास ने भारत सरकार से उसकी प्रसिद्ध 'आरोग्य मैत्री' योजना के अंतर्गत विशेष सहायता भेजने का अनुरोध किया है। उल्लेखनीय है कि इस मानवीय परियोजना की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई थी, जिसके तहत प्राकृतिक आपदाओं अथवा मानवीय त्रासदियों का सामना कर रहे विकासशील राष्ट्रों को आवश्यक चिकित्सीय सामग्रियां और दवाएं उपलब्ध कराने का संकल्प व्यक्त किया गया था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के डरावने आंकड़े और मलबे की त्रासदी

दूतावास ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न विनियामक संस्थाओं की रिपोर्टों का हवाला देते हुए स्थिति को 'अभूतपूर्व मानवीय संहार' की संज्ञा दी है। संघर्ष के 986वें दिन गाजा पट्टी के 36 प्रमुख अस्पतालों में से केवल 19 चिकित्सालय ही किसी तरह आंशिक रूप से काम कर पा रहे हैं। अस्पतालों के पास जनरेटर चलाने के लिए ईंधन, डायलिसिस किट और रक्त की भारी किल्लत है। इस विभीषिका के बीच, मलबे के नीचे लगभग 12,000 शवों के दबे होने की आशंका है, जिससे गंभीर संक्रामक और चर्म रोग फैल रहे हैं। यह संकट अब वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम तक फैल चुका है, जहां कर राजस्व रोके जाने से वित्तीय व्यवस्था ध्वस्त हो गई है।

दवाइयों का अकाल, टलीं सर्जरियां और 100 मिलियन डॉलर की गुहार

क्षेत्र में दवाओं की अनुपलब्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय की अनिवार्य सूची में शामिल 520 आवश्यक दवाओं में से लगभग 180 औषधियां बाजार से पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। कैंसर और ट्यूमर के इलाज के लिए जरूरी 97 दवाओं में से 50 का स्टॉक शून्य हो चुका है, जिससे 4,000 से अधिक कैंसर पीड़ित मरीजों के जीवन पर सीधे मौत का संकट मंडरा रहा है। संसाधनों के अभाव में इस वर्ष 11,000 से ज्यादा निर्धारित ऑपरेशन स्थगित करने पड़े हैं। इस विकराल संकट से निपटने के लिए फिलिस्तीनी दूतावास ने भारत सरकार, भारतीय चिकित्सा संस्थानों और नागरिक समाज से सामूहिक रूप से 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग सौ मिलियन डॉलर) मूल्य की जीवन रक्षक दवाएं तथा सर्जिकल उपकरण आपातकालीन आधार पर उपलब्ध कराने की पुरजोर याचना की है।

अमेरिकी नाकाबंदी हटते ही ईरान का बड़ा फैसला, समुद्री जहाजों के लिए बदले नियम

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तेहरान। वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान ने एक बहुत बड़ा नीतिगत परिवर्तन किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के मध्य संपन्न हुए 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) के आलोक में अब किसी भी वाणिज्यिक पोत या जहाज को इस जलमार्ग से सीधे गुजरने की स्वतंत्रता नहीं होगी। ईरान सरकार द्वारा लागू की गई नई विनियामक व्यवस्था के अंतर्गत अब केवल उन्हीं जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से आवागमन की अनुमति मिलेगी जो पूर्व में इसके लिए औपचारिक आवेदन करेंगे और निर्धारित दिशा-निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन करेंगे। चूंकि वैश्विक स्तर पर कुल कच्चे तेल और एलएनजी के लगभग पांचवें हिस्से का परिवहन इसी संकीर्ण मार्ग से होता है, इसलिए ईरान के इस रणनीतिक कदम को अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

परमिट आधारित नई व्यवस्था और कड़े सुरक्षा नियम

इस ऐतिहासिक बदलाव से पूर्व होर्मुज जलडमरूमध्य से पारगमन के लिए किसी विशेष प्रशासनिक परमिशन की आवश्यकता नहीं होती थी और जहाज अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों के अनुरूप यहां से गुजरते थे। हालांकि, अब ईरान ने 'पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी' (पीजीएसए) नामक एक नई नोडल एजेंसी का गठन कर संपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह से बदल दिया है। नए नियमों के तहत प्रत्येक जहाज को होर्मुज क्षेत्र में प्रवेश करने से कम से कम 48 घंटे पहले ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रस्तुत करना होगा। इस डिजिटल आवेदन में जहाज का नाम, पंजीकृत ध्वज, आईएमओ नंबर, कार्गो (सामान) की विस्तृत प्रकृति, स्वामित्व का विवरण, बीमा प्रपत्र और चालक दल के सदस्यों की राष्ट्रीयता जैसी अत्यंत गोपनीय जानकारियां साझा करनी होंगी। यदि कोई भी दस्तावेज या सूचना अपूर्ण पाई जाती है, तो पीजीएसए को आवेदन लंबित रखने या उसे पूरी तरह से निरस्त करने का सर्वाधिकार होगा।

सीमित वैधता, निर्धारित समुद्री मार्ग और बीमा के नए प्रावधान

ईरान की नई एजेंसी द्वारा आवेदन स्वीकृत किए जाने के उपरांत जहाजों को एक विशिष्ट पारगमन परमिट जारी किया जाएगा, जो केवल एक बार की यात्रा के लिए और अधिकतम पांच दिनों तक ही वैध रहेगा। समय सीमा समाप्त होने पर नया आवेदन करना अनिवार्य होगा। इसके अतिरिक्त, जहाजों को अपनी मर्जी से मार्ग बदलने की अनुमति नहीं होगी; उन्हें लारक द्वीप के समीप से गुजरने वाले ईरान द्वारा निर्धारित आधिकारिक रूट का ही अनुसरण करना होगा। तय मार्ग से हटने पर होने वाले किसी भी नुकसान या दंडात्मक कार्रवाई की पूरी जिम्मेदारी जहाज के कप्तान और मालिक की होगी। इस व्यवस्था के अंतर्गत जहाजों के लिए पीजीएसए से मान्यता प्राप्त बीमा होना भी आवश्यक कर दिया गया है। सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि आवेदन प्रक्रिया के दौरान जहाज मालिकों को एक घोषणा पत्र पर सहमति देनी होगी, जिसके तहत वे भविष्य में इस नियामक एजेंसी के किसी भी निर्णय को विधिक चुनौती नहीं दे सकेंगे।

शुरुआती रियायतें और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

द्विपक्षीय समझौते की शर्तों के अनुसार, पहले 60 दिनों की प्रारंभिक अवधि के दौरान जहाजों से नौवहन सहायता, सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और बीमा जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और इसका संपूर्ण वित्तीय भार ईरानी सरकार स्वयं वहन करेगी। हालांकि, यह कर-मुक्त सुविधा केवल अस्थायी है और ईरान ने भविष्य में इन सेवाओं पर भारी शुल्क लगाने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। भारत, जो अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है, सहित चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख वैश्विक उपभोक्ता इस नई व्यवस्था पर पैनी नजर रख रहे हैं। वर्तमान में भू-राजनीतिक तनाव कम होने से समुद्री यातायात सुचारू होने की उम्मीद तो जगी है, परंतु दूरगामी रूप से सख्त नियमों और भावी शुल्कों के कारण वैश्विक शिपिंग लागत में बढ़ोतरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

सयोनी के बाद अब महुआ मोइत्रा भी नाराज? बगावत की अटकलों से गरमाई बंगाल की राजनीति

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल के सियासी समर में जारी भारी उठापटक के मध्य तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की तेजतर्रार सांसद महुआ मोइत्रा एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं। राज्य में पार्टी के भीतर उपजे असंतोष और कई वरिष्ठ चेहरों द्वारा अलग राह पकड़े जाने के दौर में महुआ द्वारा केंद्र सरकार के एक हालिया निर्णय की सराहना किए जाने के बाद राजनीतिक हलकों में कयासबाजियों का बाजार गर्म हो गया है।

नीतिगत सराहना और राजनीतिक वफादारी में अंतर

इन तमाम चर्चाओं पर विराम लगाते हुए महुआ मोइत्रा ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार की किसी जनहितैषी नीति की प्रशंसा करने का अर्थ यह कतई नहीं है कि उनकी राजनैतिक विचारधारा बदल गई है। उन्होंने पूरी दृढ़ता के साथ कहा कि उनकी अटूट निष्ठा तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्पित है। अपने हालिया बयानों में उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि टीएमसी की वास्तविक पहचान, उसका वजूद और स्वीकार्यता पूरी तरह से ममता बनर्जी के करिश्माई नेतृत्व पर ही टिकी हुई है।

आंतरिक कलह से जूझ रही पार्टी और बागियों पर प्रहार

गौरतलब है कि हालिया चुनावी झटकों और आंतरिक मतभेदों के कारण तृणमूल कांग्रेस इस समय एक बेहद चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील दौर का सामना कर रही है। ऐसे समय में कई सांसदों और रसूखदार नेताओं के विद्रोही रुख अपनाने पर महुआ मोइत्रा ने लगातार आक्रामक रुख अख्तियार किया हुआ है। उन्होंने पाला बदलने वाले नेताओं पर जनता के जनादेश के साथ छल करने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला और चुनौती दी कि यदि वे दल की मूल नीतियों से असहमत हैं, तो उन्हें तुरंत अपने पदों से त्यागपत्र देकर दोबारा जनता की अदालत में जाना चाहिए।

विपक्षी साजिश के दावों को किया सिरे से खारिज

सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी धड़े के उन तमाम दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है जिसमें पार्टी के भविष्य पर संकट बताया जा रहा था। उन्होंने विश्वास जताया कि टीएमसी इस मौजूदा संकट से उबरकर पहले से कहीं अधिक मजबूती के साथ वापसी करेगी। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस को कमजोर करने और उसमें फूट डालने के इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सोची-समझी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है। बहरहाल, केंद्र की पहल की तारीफ भले ही चर्चा में हो, लेकिन महुआ के तेवर साफ करते हैं कि वे ममता बनर्जी के साथ चट्टान की तरह खड़ी हैं।

200 करोड़ के घोटाले की आशंका, क्लोन ऐप के जरिए मनरेगा में बड़ा खेल

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भोपाल। ग्रामीण अंचलों में आजीविका और रोजगार की गारंटी देने वाली महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) में एक बेहद गंभीर और बड़े वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले मजदूरों की हाजिरी लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाले आधिकारिक 'नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम' (एनएमएमएस) का एक जाली यानी क्लोन एप्लीकेशन विकसित कर लिया गया है। इस फर्जी मोबाइल ऐप के माध्यम से बड़े पैमाने पर मजदूरों की नकली उपस्थिति दर्ज कर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये का अवैध भुगतान करा लिया गया, जिसे लेकर अब दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है।

क्लोन ऐप से 200 करोड़ के गबन का आरोप और सीबीआई जांच की मांग

इस सुनियोजित डिजिटल घोटाले की गूंज मुरैना सहित मध्य प्रदेश के कई अन्य जनपदों में सुनाई दे रही है। लांजी विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक किशोर समरीते ने इस महाफर्जीवाड़े को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल को एक विस्तृत शिकायती पत्र भेजा है। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी उच्च स्तरीय जांच देश की शीर्ष एजेंसी सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) से कराने की पुरजोर वकालत की है। शिकायत में यह संगीन आरोप लगाया गया है कि एनएमएमएस ऐप के साथ छेड़छाड़ कर या उसका टेंपर्ड वर्जन बनाकर पिछले दो वर्षों से बिना कार्यस्थल पर जाए, बिना किसी वास्तविक जियो-टैगिंग और प्रशासनिक सत्यापन के ही जॉब कार्ड धारकों की हाजिरी दर्ज की जा रही थी, जिससे लगभग 200 करोड़ रुपये के सरकारी धन का गबन किया गया है।

मनरेगा योजना की समाप्ति और नई व्यवस्था की ओर कदम

तकनीकी प्रणाली में सेंधमारी कर किए जा रहे इस निरंतर घोटाले के बीच एक और महत्वपूर्ण प्रशासनिक जानकारी सामने आई है कि वर्तमान मनरेगा व्यवस्था आगामी 30 जून से पूरी तरह से समाप्त होने जा रही है। इस पुरानी व्यवस्था के स्थान पर सरकार द्वारा ग्रामीण रोजगार के सुचारू संचालन के लिए एक नई योजना 'वीबीजीरामजी' (VBGRAMJI) को धरातल पर लागू किया जाएगा। माना जा रहा है कि नई व्यवस्था के तहत सुरक्षा और पारदर्शिता के ऐसे कड़े मानक तय किए जाएंगे जिससे भविष्य में डिजिटल माध्यमों या मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए होने वाली किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं पर पूरी तरह से नकेल कसी जा सके।

मुरैना में आपराधिक मुकदमा दर्ज और डिजिटल सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न

इस व्यापक वित्तीय धांधली के उजागर होते ही प्रशासनिक स्तर पर हड़कंप मच गया है और मुरैना के जिला कलेक्टर लोकेश कुमार जांगिड़ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए 1 जून को ही दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने के कड़े आदेश जारी किए थे। कलेक्टर के निर्देशानुसार खड़कपुर ग्राम पंचायत के संबंधित सहायक के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा पंजीकृत कर लिया गया है। इस चौंकाने वाले मामले ने सरकारी योजनाओं को पूरी तरह डिजिटल और पेपरलेस बनाने की मौजूदा व्यवस्था की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर बहुत बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

SIP की यह ट्रिक कर सकती है बैकफायर, 25 हजार को 10 हिस्सों में बांटने से पहले जान लें सच

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नई दिल्ली। अधिकांश निवेशक एक बेहद सुव्यवस्थित रणनीति के साथ म्यूचुअल फंड में अपने निवेश का सफर शुरू करते हैं। वे सबसे पहले एक सामान्य सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) चुनते हैं, फिर टैक्स में छूट पाने के लिए एक टैक्स सेवर फंड जोड़ते हैं। इसके बाद स्मॉल-कैप की चर्चा सुनकर एक और स्कीम ले लेते हैं और इंटरनेट पर आकर्षक रिटर्न देखकर सेक्टोरल या मिड-कैप फंड्स में भी पैसा लगा देते हैं। कुछ समय बाद उन्हें पता चलता है कि वे बिना किसी ठोस रणनीति के हर महीने 8 से 15 अलग-अलग फंड्स में निवेश कर रहे हैं, जिनमें से ज्यादातर में एक ही जैसी कंपनियों के शेयर शामिल होते हैं। यहीं से पोर्टफोलियो में जरूरत से ज्यादा दोहराव (ओवर-डाइवर्सिफिकेशन) की समस्या जन्म लेती है।

संतुलित और फोकस्ड पोर्टफोलियो का महत्व

वित्तीय सलाहकारों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति एसआईपी के माध्यम से हर महीने लगभग 25,000 रुपये का निवेश कर रहा है, तो उसका लक्ष्य केवल फंड्स की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। मुख्य उद्देश्य एक ऐसा केंद्रित और सुगठित पोर्टफोलियो तैयार करना है जो जोखिम को तो कम करे, लेकिन साथ ही जिसे आसानी से ट्रैक और मैनेज भी किया जा सके। एक निश्चित सीमा के बाद पोर्टफोलियो में नई योजनाएं शामिल करने से न तो रिस्क मैनेजमेंट में कोई खास सुधार होता है और न ही मुनाफे में बढ़ोतरी होती है, बल्कि इससे केवल भ्रम और अव्यवस्था पैदा होती है।

अत्यधिक विविधीकरण से घटती है प्रदर्शन की ताकत

पोर्टफोलियो में बहुत ज्यादा फंड्स रखने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली स्कीम्स का मुनाफा भी दब जाता है। जब 25,000 रुपये की कुल राशि को 10 या 12 अलग-अलग जगहों पर बांट दिया जाता है, तो प्रत्येक फंड में लगने वाली पूंजी बेहद मामूली रह जाती है। ऐसी स्थिति में यदि कोई एक फंड असाधारण रिटर्न भी कमा कर दे, तो कुल निवेश पर उसका सकारात्मक प्रभाव बहुत कम दिखता है। इसके अलावा, इतने बड़े पोर्टफोलियो की समय-समय पर समीक्षा करना निवेशकों के लिए एक सिरदर्द बन जाता है, जिसके कारण वे बाजार के उतार-चढ़ाव को देखकर बिना सोचे-समझे इमोशनल फैसले लेने लगते हैं।

डाइवर्सिफिकेशन और इसके अतिरेक में बुनियादी अंतर

निवेश में जोखिम को कम करने के लिए डाइवर्सिफिकेशन बेहद जरूरी है ताकि किसी एक क्षेत्र या कंपनी पर निर्भरता न रहे। हालांकि, ओवर-डाइवर्सिफिकेशन की स्थिति तब आती है जब नए फंड्स जोड़ने से पोर्टफोलियो को कोई सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि केवल निवेश का दोहराव होने लगता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि बारिश में एक साथ कई छाते लेकर चलने से कोई अतिरिक्त सुरक्षा नहीं मिलती, केवल बोझ बढ़ता है। म्यूचुअल फंड में भी ठीक ऐसा ही होता है; योजनाओं की संख्या बढ़ा देने मात्र से आपका पैसा अधिक सुरक्षित या अधिक लाभदायक नहीं हो जाता।

गोल्ड-सिल्वर हुआ सस्ता! दिल्ली, मुंबई समेत प्रमुख शहरों में क्या है आज का भाव?

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नई दिल्ली। भारतीय सर्राफा बाजार में शनिवार को बहुमूल्य धातुओं की कीमतों में आंशिक मंदी का रुख देखने को मिल रहा है। बाजार से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, आज घरेलू सर्राफा बाजार में 24 कैरेट वाले शुद्ध सोने की कीमत लगभग 1,46,480 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बनी हुई है, जबकि औद्योगिक मांग कमजोर होने से चांदी का भाव करीब 2,50,000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है। इसके अतिरिक्त, आभूषण निर्माताओं द्वारा पसंद किए जाने वाले 22 कैरेट सोने की दर आज 1,39,500 रुपये प्रति 10 ग्राम और 18 कैरेट सोने का मूल्य 1,12,270 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया है।

महानगरों और प्रमुख शहरों में धातुओं के नवीनतम दाम

देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय टैक्स और चुंगी के कारण सोने-चांदी की कीमतों में भिन्नता देखी जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और गाजियाबाद में आज 24 कैरेट सोना 1,46,480 रुपये तथा 22 कैरेट सोना 1,39,500 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बिक रहा है। आर्थिक राजधानी मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु में इन दोनों श्रेणियों के दाम समान बने हुए हैं, जहां 24 कैरेट के लिए 1,49,500 रुपये और 22 कैरेट के लिए 1,37,040 रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है। दक्षिण भारत के प्रमुख केंद्र चेन्नई में सोने की कीमतें सबसे उच्च स्तर पर हैं, जहां 24 कैरेट का भाव 1,52,170 रुपये और 22 कैरेट का भाव 1,39,490 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया है।

घरेलू बाजारों में चांदी की शहरवार स्थिति

सफेद धातु यानी चांदी की कीमतों में भी भौगोलिक स्थिति के आधार पर उतार-चढ़ाव बना हुआ है और देश भर में इसका व्यापक दायरा 2,49,900 रुपये से लेकर 2,55,000 रुपये प्रति किलोग्राम के मध्य देखा जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर और गाजियाबाद के बाजारों में चांदी आज 2,55,000 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर स्थिर है, जबकि मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय व्यापारिक केंद्रों में इसकी कीमत थोड़ी कम यानी 2,49,900 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई है। इस बीच, चेन्नई के बाजारों में चांदी की मांग सबसे तेज होने के कारण वहां की कीमत अन्य शहरों की तुलना में काफी ऊपर 2,70,000 रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर चल रही है।

वैश्विक मंदी और अमेरिकी आर्थिक नीतियों का असर

कमोडिटी विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर और घरेलू वायदा बाजार (एमसीएक्स) पर कीमती धातुओं में आ रही इस निरंतर गिरावट के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व (यूएस फेड) के कड़े मौद्रिक रुख को मुख्य कारण माना जा रहा है। फेडरल रिजर्व ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आगामी समय में ब्याज दरों में और वृद्धि करने के संकेत दिए हैं, जिससे निवेशक सोने जैसी बिना ब्याज वाली सुरक्षित संपत्तियों के बजाय सरकारी बॉन्ड्स में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर के एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचने से अन्य देशों की मुद्राओं के लिए सोना खरीदना महंगा हो गया है, जिससे इसकी वैश्विक मांग प्रभावित हुई है। साथ ही, अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया शांति समझौते ने भू-राजनीतिक तनाव को कम किया है, जिसके चलते निवेशकों ने सुरक्षित माने जाने वाले सोने से दूरी बनाकर दोबारा शेयर बाजार का रुख करना शुरू कर दिया है।

NTA की लापरवाही या तकनीकी गलती? नागपुर के छात्र को आवंटित हुआ अबू धाबी सेंटर

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नागपुर। नीट-यूजी 2026 की पुनर्परीक्षा आयोजित होने से ठीक 24 घंटे पहले महाराष्ट्र के नागपुर में एक बेहद अजीबोगरीब मामला प्रकाश में आया है, जिसने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के प्रबंधन पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यहां के एक छात्र ने परीक्षा के लिए नागपुर को अपनी प्राथमिकता सूची में पहले स्थान पर रखा था, परंतु जब उसने अपना नया प्रवेश पत्र (एडमीट कार्ड) डाउनलोड किया, तो उसमें परीक्षा केंद्र सीधे संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी शहर में दर्शाया गया। रविवार 21 जून को होने वाली इस परीक्षा के लिए चंद घंटों के भीतर विदेश पहुंचकर परीक्षा में बैठना अभ्यर्थी और उसके परिजनों के लिए पूरी तरह असंभव हो गया है।

नागपुर के बजाय मिला सात समंदर पार का केंद्र

पीड़ित छात्र को पूर्व में आयोजित हुई मूल परीक्षा के लिए नागपुर के ही सरस्वती विद्यालय में परीक्षा केंद्र मिला था। मगर पेपर लीक के उपद्रव के बाद जब एनटीए ने प्रभावित छात्रों के लिए दोबारा परीक्षा कराने का निर्णय लिया और नए प्रवेश पत्र वेबसाइट पर डाले, तो इस छात्र का केंद्र बदलकर 'अबू धाबी इंडियन स्कूल' कर दिया गया। छात्र के पिता मोहम्मद तालिब के मुताबिक, आवेदन पत्र भरते समय उनके बेटे ने प्राथमिकताओं में नागपुर, वर्धा और भंडारा जैसे नजदीकी शहरों का चयन किया था। हैरान करने वाली बात यह भी है कि छात्र के पास अभी तक पासपोर्ट भी उपलब्ध नहीं है। इस घोर लापरवाही की शिकायत तुरंत एनटीए की हेल्पलाइन पर दर्ज कराई गई है, जहां अधिकारियों ने इसे तकनीकी त्रुटि मानते हुए जल्द ही संशोधित प्रवेश पत्र जारी करने का भरोसा दिया है, लेकिन परीक्षा के ठीक पहले आई इस विपदा से छात्र गहरे मानसिक तनाव में है।

प्रशासनिक चूक पर तीखी प्रतिक्रिया और सुरक्षात्मक इंतजाम

इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. अनीस अहमद ने इसे एक अक्षम्य प्रशासनिक लापरवाही करार दिया है। उन्होंने मांग की है कि एनटीए अविलंब अपनी गलती को सुधारे और छात्र को स्थानीय स्तर पर परीक्षा देने की अनुमति प्रदान करे, क्योंकि यह त्रुटि परीक्षा संचालन की साख को धूमिल करती है। दूसरी तरफ, एनटीए ने दावा किया है कि इस पुनर्परीक्षा को पूरी तरह पारदर्शी और नकलविहीन बनाने के लिए अभूतपूर्व सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं। सभी प्रश्नपत्रों और परीक्षा सामग्रियों को जीपीएस आधारित वाहनों व कड़ी पुलिस अभिरक्षा में केंद्रों तक भेजा जा रहा है। इसके अलावा, सभी संवेदनशील परीक्षा स्थलों पर सीसीटीवी कैमरों से सघन निगरानी रखने के साथ-साथ बायोमेट्रिक सत्यापन और वास्तविक समय (रियल टाइम) मॉनिटरिंग की तकनीक लागू की गई है।

पुनर्परीक्षा का समय, आवश्यक नियम और गाइडलाइंस

नीट-यूजी 2026 की यह विशेष पुनर्परीक्षा 21 जून को दोपहर 2:00 बजे से सायंकाल 5:15 बजे तक पारंपरिक पेन-एंड-पेपर (ऑफलाइन) माध्यम से संपन्न होगी। इस राष्ट्रव्यापी परीक्षा के लिए भारत के 551 शहरों सहित विदेशों के 14 केंद्रों पर व्यवस्थाएं की गई हैं, जिसमें 22.79 लाख से अधिक परीक्षार्थियों के सम्मिलित होने का अनुमान है। परीक्षा को सुचारू ढंग से चलाने के लिए देश भर में दो लाख से ज्यादा पर्यवेक्षकों और पुलिस कर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। एनटीए द्वारा जारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी अभ्यर्थियों को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे के बीच अनिवार्य रूप से अपने निर्धारित केंद्रों पर रिपोर्ट करना होगा। दोपहर 1:30 बजे के बाद परीक्षा केंद्र के मुख्य द्वार पूरी तरह बंद कर दिए जाएंगे और किसी भी परिस्थिति में विलंब से आने वाले परीक्षार्थी को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलेगी।

बारिश बनी चुनौती, गांव वालों ने कंधों पर उठाकर नदी पार कराई और पहुंचाया दूल्हा

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किशनगंज। भारत-नेपाल सीमा से सटे इस सीमावर्ती जिले के ठाकुरगंज प्रखंड अंतर्गत दल्लेगांव से एक ऐसी विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने बुनियादी विकास के दावों की पोल खोल कर रख दी है। सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे एक वीडियो और तस्वीरों में एक दूल्हा अपनी बारात के साथ उफनती हुई मेची नदी को पार करने के लिए ग्रामीणों के कंधों पर सवार दिखाई दे रहा है। सुदूर इलाके के इस गांव में नदी पर पुल की सुविधा न होने के कारण पूरी बारात को इसी प्रकार जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ी।

कंधों का सहारा लेकर पार हुआ उफनता दरिया

प्राप्त विवरण के अनुसार, दल्लेगांव में एक विवाह समारोह संपन्न होना था, जिसमें शामिल होने आ रही बारात के रास्ते में मेची नदी मुख्य बाधा बनी हुई थी। मानसूनी बारिश के कारण नदी का जलस्तर काफी बढ़ा हुआ था और वहां चल रहा पुल का निर्माण कार्य अधूरा होने के कारण आवागमन पूरी तरह अवरुद्ध था। नदी पार करने का कोई अन्य सुरक्षित जरिया या नाव उपलब्ध न होने पर स्थानीय ग्रामीणों ने सूझबूझ दिखाई और दूल्हे को अपने कंधों पर बिठाकर अत्यंत सावधानी से नदी के दूसरे किनारे तक पहुंचाया। इस अनोखी और लाचारी से भरी विदाई का वीडियो वहां उपस्थित किसी ग्रामीण ने अपने कैमरे में सहेज लिया, जो अब इंटरनेट पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है।

वर्षों से अधर में लटका है सेतु का निर्माण

क्षेत्रीय नागरिकों ने इस अव्यवस्था पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए बताया कि दल्लेगांव और उसके समीपवर्ती दर्जनों गांवों को मुख्य सड़क मार्ग से जोड़ने के उद्देश्य से मेची नदी पर पुल का निर्माण कार्य वर्षों पूर्व स्वीकृत और शुरू किया गया था, परंतु प्रशासनिक ढुलमुल नीति के कारण यह आज तक मुकम्मल नहीं हो पाया। शुष्क मौसम में तो ग्रामीण नदी की उथली धारा को जैसे-तैसे लांघ लेते हैं, किंतु वर्षा ऋतु आते ही पूरा क्षेत्र टापू में तब्दील हो जाता है। पुल न होने का खामियाजा प्रतिदिन स्कूल जाने वाले नौनिहालों, गंभीर मरीजों, अपनी उपज मंडी तक ले जाने वाले किसानों और आम राहगीरों को भुगतना पड़ता है। कई बार चिकित्सा आपातकाल के समय लोग जान हथेली पर रखकर उफनते पानी के बीच से गुजरने को मजबूर होते हैं।

वायरल दृश्यों ने खड़े किए व्यवस्था पर गंभीर सवाल

दूल्हे को कंधों पर बिठाकर नदी पार कराने के इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। जहां एक तरफ लोग विषम परिस्थितियों में ग्रामीणों द्वारा की गई इस आपसी सहायता और अनूठे अंदाज की तारीफ कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नेटिजन्स और स्थानीय जनता अधूरे पड़े बुनियादी ढांचे को लेकर शासन-प्रशासन तथा क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर तीखे सवाल उठा रही है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जब तक इस महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक हजारों की आबादी को प्रतिवर्ष इसी प्रकार की जानलेवा दिक्कतों से दो-चार होना पड़ेगा। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मॉनसून की गंभीरता को देखते हुए इस दिशा में त्वरित और ठोस कदम उठाने की पुरजोर मांग की है।

अंतरिम संरक्षण बढ़ने से फैजल खान को राहत, विरोधी पक्ष के गंभीर आरोपों से बढ़ी हलचल

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पटना। बिहार की राजधानी के चर्चित कोचिंग विवाद मामले में विख्यात शिक्षक फैजल खान (खान सर) को न्यायपालिका से एक बड़ी राहत मिली है। शनिवार को पटना सिविल कोर्ट में संपन्न हुई एक महत्वपूर्ण वैधानिक कार्यवाही के दौरान अदालत ने फैजल खान की अग्रिम जमानत अर्जी पर विचार करते हुए उनके अंतरिम राहत के दायरे को आगामी सुनवाई तक के लिए विस्तारित कर दिया है। न्यायालय के इस न्यायिक आदेश के बाद अगली निर्धारित तिथि तक खान सर की संभावित गिरफ्तारी पर स्थगन आदेश प्रभावी रहेगा।

केस डायरी का अवलोकन और दंडात्मक कार्रवाई पर रोक

शनिवार की अदालती कार्यवाही के दौरान जांच एजेंसी की ओर से मामले की अद्यतन केस डायरी (जांच प्रतिवेदन) न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की गई। केस डायरी के कानूनी तथ्यों का बारीकी से अध्ययन करने के पश्चात अदालत ने बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के वकीलों की दलीलों को सुना। न्यायालय ने वर्तमान परिस्थितियों में कोई भी अंतिम निर्णय पारित करने के बजाय मामले में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, अदालत ने फैजल खान और उनके सहयोगियों को दंडात्मक संरक्षण (नो कोर्सिव एक्शन) प्रदान करते हुए पुलिस प्रशासन को किसी भी तरह की दमनकारी या कठोर कार्रवाई न करने की हिदायत दी है।

सुरक्षाकर्मियों की अर्जी पर तीखी कानूनी बहस

इस बहुचर्चित प्रकरण में विधिक प्रक्रिया उस समय और अधिक पेचीदा हो गई, जब मुख्य आरोपी के साथ-साथ उनके दोनों निजी सुरक्षाकर्मियों की जमानत याचिकाएं भी विचारार्थ पटल पर रखी गईं। अदालत कक्ष में एक ओर जहां मुख्य आरोपी फैजल खान को अंतरिम सुरक्षा मिल गई, वहीं दूसरी ओर उनके अंगरक्षकों की विधिक रिहाई के प्रश्न पर दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं के मध्य तीखे वैधानिक तर्क-वितर्क और कानूनी दांव-पेंच देखने को मिले।

विपक्षी खेमे के संगीन दावे और एफआईआर की मांग

इससे पूर्व, विरोधी पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन कुमार ने खान सर की अग्रिम जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने पीठ के समक्ष यह दलील दी कि इस कथित आपराधिक साजिश और कोचिंग विवाद की पूरी रूपरेखा 'खान ग्लोबल स्टडीज' संस्थान के भीतर ही तैयार की गई थी। उन्होंने न्यायालय को अवगत कराया कि पीड़ित रौशन आनंद द्वारा कदमकुआं थाने में लिखित शिकायत दिए जाने के उपरांत भी अब तक पुलिस द्वारा औपचारिक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है, जबकि इसके पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं। विपक्षी वकील ने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि पीड़ित पर कारागार के भीतर भी जानलेवा हमले का प्रयास किया गया और उनके भाई प्रिंस के साथ भी अमानवीय कृत्य हुआ है, जिसके कारण इस पूरे नेक्सस की निष्पक्ष व उच्च स्तरीय जांच अनिवार्य है।

कोलकाता एयरपोर्ट पर सियासी संग्राम, अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में भिड़े भाजपा और TMC समर्थक

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कोलकाता। नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उस समय अफरातफरी और तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के समर्थक आपस में भिड़ गए। दोनों राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हवाई अड्डा परिसर में ही जमकर लात-घूंसे चले और हिंसक झड़प हुई। इस घटना के कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं, जिसमें दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे के साथ मारपीट और धक्का-मुक्की करते हुए साफ नजर आ रहे हैं।

नेताओं के आगमन से पहले उपजा विवाद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पूरा विवाद तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के दिल्ली से वापस कोलकाता आगमन से ठीक पहले शुरू हुआ। हवाई अड्डे पर पहले से मौजूद टीएमसी समर्थकों ने आशंका जताई कि भाजपा के कुछ कार्यकर्ता अभिषेक बनर्जी के खिलाफ प्रदर्शन करने तथा उन पर अंडे फेंकने के इरादे से वहां जमा हुए थे। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच पहले तीखी नोकझोंक हुई, जिसने देखते ही देखते एक बड़े खूनी संघर्ष का रूप ले लिया। हवाई अड्डे जैसे संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में हुई इस घटना से वहां मौजूद आम यात्रियों में भय का माहौल बन गया, जिसे नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।

सुरक्षा व्यवस्था और हथियारों की मौजूदगी पर उठे सवाल

इस हिंसक झड़प के बाद टीएमसी समर्थकों ने दावा किया कि वे केवल अपने नेता की अगवानी के लिए शांतिपूर्वक खड़े थे, तभी विपरीत विचारधारा के लोग वहां माहौल बिगाड़ने पहुंच गए। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों के पास न केवल अंडे थे, बल्कि उनमें से कुछ लोगों ने हथियार तक लहराए। सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं ने इसे सुरक्षा में एक बड़ी चूक बताते हुए सवाल उठाया कि हवाई अड्डे की कड़े पहरे वाली सीमा के भीतर कोई भी व्यक्ति घातक सामान लेकर कैसे प्रवेश कर सकता है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन से इस पूरे घटनाक्रम की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों को चिन्हित कर दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग की है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और मामले की विधिक जांच

दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए एक अलग दृष्टिकोण सामने रखा है। केंद्रीय मंत्री सुकांता मजूमदार ने इस हिंसक वारदात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से शांति व संयम बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है और सभी को प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए। फिलहाल, एयरपोर्ट थाना पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सीसीटीवी फुटेज तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर मामले की गहनता से तफ्तीश कर रही हैं। यह घटना एक बार फिर राज्य में दोनों प्रमुख दलों के बीच बढ़ते राजनीतिक गतिरोध को बयां करती है।

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