कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में हमेशा चर्चा का विषय रहने वाले 'सिंडिकेट सिस्टम' की शुरुआत वैसे तो वामपंथी शासन (लेफ्ट) के दौर में मानी जाती है, लेकिन राजनीतिक आलोचकों का साफ कहना है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सत्ता में आने के बाद इसका दायरा और भी ज्यादा बढ़ गया। राज्य में होने वाले किसी भी तरह के निर्माण कार्य, मजदूरों की सप्लाई, रेत के अवैध खनन और जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े मामलों में इस सिंडिकेट और इससे जुड़ी अवैध वसूली की चर्चा अक्सर खुलकर होती रही है। हाल के कुछ महीनों में भ्रष्टाचार के इन्हीं गंभीर आरोपों के चलते कई टीएमसी नेताओं को आम जनता के भारी आक्रोश और विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अब पार्टी के सामने केवल राजनीतिक विरोधियों से निपटने की ही चुनौती नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर आम लोगों के बीच बढ़ती भारी नाराजगी को संभालना भी एक बड़ी परीक्षा बन गया है।
अस्तित्व बचाने के लिए ममता बनर्जी की जंग
एक तरफ जहां टीएमसी के अंदरूनी ढांचे में दरारें आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर भी पार्टी की पकड़ कमजोर होती दिख रही है। ऐसे मुश्किल दौर में ममता बनर्जी अपनी पार्टी को बिखरने से बचाने के लिए जी-जान से संघर्ष कर रही हैं। राज्य के हालिया चुनाव नतीजों के बाद से ही यहां का माहौल बहुत तेजी से बदला है। दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर इलाके के स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहले जिन टीएमसी नेताओं और दबंग कार्यकर्ताओं का पूरे क्षेत्र में एकतरफा दबदबा हुआ करता था, वे अब बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। कई लोगों ने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि पिछले कई वर्षों से वे केवल डर और राजनीतिक दबाव के कारण अपनी शिकायतें खुलकर दर्ज नहीं करा पा रहे थे।
बदली व्यवस्था और खुलकर सामने आते लोग
रूपाली मंडल नाम की स्थानीय पीड़ित महिला ने दावा किया कि पहले बिना किसी कारण के उनकी दुकान को जबरन तोड़ दिया गया था और उस समय उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिली थी, लेकिन अब वे सुरक्षित अपने घर लौट आई हैं। इसके साथ ही, कई अन्य स्थानीय लोगों का भी कहना है कि चुनाव संपन्न होने के बाद अब पुलिस ने उनकी पुरानी और दबी हुई शिकायतों पर उचित कानूनी कार्रवाई करना शुरू कर दिया है। क्षेत्र के स्थानीय भाजपा नेताओं का दावा है कि राजनीतिक भय का माहौल कम होने के कारण अब आम जनता बिना किसी डर के खुलकर अपनी पुरानी समस्याएं और शिकायतें सामने रख पा रही है।









