नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केंद्र सरकार द्वारा आगामी सप्ताह संसद में पेश किए जाने वाले 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन (संशोधन) विधेयक, 2026' के प्रावधानों की कड़े शब्दों में आलोचना की है। उन्होंने प्रस्तावित बदलावों को कार्यपालिका के अधिकारों का अनियंत्रित विस्तार करार देते हुए कहा कि इससे सरकार और गैर-सरकारी संगठनों के संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
प्रस्तावित अथॉरिटी और संपत्ति नियंत्रण पर उठाए सवाल
एक अंग्रेजी समाचार पत्र में लिखे अपने लेख में शशि थरूर ने रेखांकित किया कि नए संशोधन के तहत यदि किसी संस्था का एफसीआरए (FCRA) पंजीकरण निरस्त, समाप्त या नवीनीकृत नहीं होता है, तो सरकार एक विशेष प्राधिकरण (अथॉरिटी) का गठन कर सकेगी। यह प्राधिकरण उस संस्था की विदेशी निधि और उससे अर्जित संपत्ति के प्रबंधन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा। थरूर ने आरोप लगाया कि सरकार सिविल सोसाइटी, थिंक टैंक और मानवाधिकार संगठनों को विकास का सहयोगी मानने के बजाय उन्हें निशाना बना रही है।
एफसीआरए नियमों की सख्ती से विदेशी फंडिंग में गिरावट
थरूर ने ध्यान दिलाया कि पहले से लागू कड़े नियमों—जैसे प्रशासनिक व्यय की सीमा घटाना, फंड ट्रांसफर पर प्रतिबंध और नई दिल्ली की एक निर्दिष्ट बैंक शाखा के माध्यम से ही धन प्राप्त करने की अनिवार्यता—के कारण विदेशी योगदान में 87 प्रतिशत तक की कमी आई है। उन्होंने विशेष रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत धर्मार्थ व सामाजिक संस्थाओं (जैसे चर्च व उससे संबद्ध ट्रस्टों) के परिचालन पर पड़ रहे प्रभाव पर चिंता व्यक्त की।
गृह मंत्रालय के आंकड़े
गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार:
2019-2022 के बीच प्राप्त विदेशी निधि: ₹55,741 करोड़ (13,520 संगठनों द्वारा)
सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र (15 जुलाई 2026 तक): 14,449
निरस्त किए गए प्रमाणपत्र: 22,498
समाप्त (एक्सपायर) प्रमाणपत्र: 15,212









