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हिजाब विवाद: समानता की पाठशाला में असमानता का हिजाब क्यों?

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कर्नाटक के उडुपी से स्कूलों में हिजाब पहनने के सवाल पर शुरू हुआ विवाद सियासी रंग लेता जा रहा है। कई राज्यों में स्कूल और कॉलेजों में ड्रेस कोड की बात भी उठ रही है। हिजाब के विरोध और हिजाब के समर्थन में राष्ट्र स्तर पर बहस चालू हो गई है। वैसे देखा जाए तो खानपान और पहनावा हर व्यक्ति नितांत व्यक्तिगत मामला है। किसी भी इनसान sampadkiy 1को क्या पहनना है, क्या खाना यह उसकी खुद की पसंद, नापसंद पर निर्भर है, इसमें बाहरी लोग हस्तक्षेप नहीं कर सकते, लेकिन जब बात स्कूल और कॉलेजों की आती है, तो एकरूपता, एकसमानता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। आखिर स्कूल-कॉलेजों में यूनिफॉर्म की संकल्पना क्यों लाई गई? इसकी क्या वजह थी। बच्चे अपनी मर्जी से कपड़े, जूते पहनकर स्कूल जा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

स्कूल-कॉलेजों में एकरूपता से कतई समझौता नहीं किया जा सकता

प्राचीनकाल में गुरुकुलों में राजा का बच्चा हो या रंक का, सभी को एकसमान पहनावा अनिवार्य था। आखिर शिक्षा संस्थानों में अलग-अलग पहनावे को स्वीकार कर जाति, धर्म, आस्था के प्रतीक चिन्ह को अनुमति कैसे दी जा सकती है? हमारा देश समानता की बुनियाद पर खड़ा है। स्कूल-कॉलेजों में अगर बच्चों को मर्जी से कपड़े पहनने की  छूट दी गई, तो शिक्षा के इन संस्थानों में जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी के बीच गहरी खाई बन जाएगी। अमीरों के बच्चे महंगे कपड़े, महंगे जूते, महंगी घडिय़ां पहनकर स्कूल जाएंगे, जबकि गरीबों के बच्चे ऐसा नहीं कर पाएंगे। इससे उनके मन में एक-दूसरे के प्रति असमानता का भाव पैदा होगा। गरीबों के बच्चों में निराशा का भाव आएगा। बच्चों के मन में समानता का भाव बना रहे, इसलिए स्कूलों में यूनिफॉर्म लागू की गई। अमीर का बच्चा हो या गरीब का, सभी एक समान यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल जाएं। उनमें किसी तरह का भेदभाव न रहे। यही वजह है कि स्कूल और कॉलेज के लिए यूनिफॉर्म का निर्धारण हमेशा से होता रहा है। आज भी कॉन्वेंट स्कूल हों या बड़े-बड़े प्रायवेट स्कूल, उनमें यूनिफॉर्म लागू है। उसे सभी पंथ, मजहब और आस्थाओं के लोग स्वीकार भी करते हैं। फिर सरकारी स्कूलों में ड्रेस कोड के खिलाफ बवाल क्यों? स्कूल सबके लिए समान हैं। ऐसे में एक धर्म विशेष के लोगों को मनमर्जी करने की छूट नहीं दी जा सकती। निजी स्तर पर हिजाब पहनने पर न तो कोई सरकार रोक लगा सकती है और न लगाना चाहिए।

लड़कियों को पीछे रखने का षड्यंत्र तो नहीं

आधुनिक समय में हर चीज़ लगातार अपडेट हो रही है। ऐसे में समय के साथ मान्यताओं, प्रथाओं को भी अद्यतन किया जाना जरूरी है। महिलाएं बराबरी के साथ पढ़ाई, लिखाई और तरक्की करना चाहती हैं। धार्मिक विश्वास के नाम पर हिजाब की संस्कृति लड़कियों को पीछे रखने का षड्यंत्र तो नहीं है। ऐसा लगता है यह विवाद अनावश्यक है और इसे जानबूझकर बढ़ाया जा रहा है। आज लड़कियों में आगे बढऩे की हिम्मत और हौसला बढ़ाने की जरूरत है, न कि ऐसे सवाल उठाकर उन्हें पीछे धकेलने की जरूरत है। दुनिया में पढ़ी लिखी मुस्लिम महिलाएं बुर्के और हिजाब के खिलाफ़ मुहिम चला रही हैं. इस मुहिम को बड़े पमाने पर मुस्लिम पुरुषों का भी समर्थन मिल रहा है। भारतीय मुस्लिम समाज में पर्दे को लकर काफी खुलापन आया है। मुस्लिम लड़किया बुर्का या हिजाब पहने या नहीं ये उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए. ये उनका संवैधानिक अधिकार भी है। स्कूलों में ड्रेस कोड के नाम पर बुर्के या हिजाब के खिलाफ प्रोपगंडा चलाना उचित नहीं है।

कुरान में हिजाब का उल्लेख नहीं

कुरान में हिजाब का उल्लेख नहीं बल्कि खिमार का उल्लेख किया गया है। हिजाब और खिमार दोनों तरीकों से महिलाओं अपना शरीर ढक सकतीं है। हालांकि इन दोनों तरीकों से शरीर को ढकने के तरीके में थोड़ा सा अंतर है। सूरह अल-अहजाब की आयत 59 में कहा गया है-ऐ पैगम्बर, अपनी पत्नियों, बेटियों और ईमान वालों की महिलाओं से कहा कि वे अपने बाहरी वस्त्रों को अपने ऊपर ले लें। यह ज्यादा उपयुक्त है। न उन्हें पहचाना जाएगा और न उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा। अल्लाह सदैव क्षमाशील और दयावान है।

बिकनी पर विवाद में फंस गईं प्रियंका

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी मंझे हुए राजनेता की तरह सधे हुए बयान देती हैं, जिससे वे कभी विवादों में नहीं फंसती, लेकिन हिजाब वाले मामले में वे विवादों में घिर गई। हिजाब के समर्थन में उतरीं प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कहा कि चाहे वह बिकिनी हो, घूंघट हो, जींस की जोड़ी हो या हिजाब; यह तय करना एक महिला का अधिकार है कि वह क्या पहनना चाहती है। यह अधिकार भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत है। महिलाओं को प्रताडि़त करना बंद करो। इस ट्वीट के बाद वे जमकर ट्रोल हुर्ईं। एक यूजर ने लिखा कि प्रियंका गांधीजी, कोई एक लड़की बताओ, जो बिकिनी, घूंघट या सिर्फ अकेली जींस में स्कूल जाती है! कृपया तथ्यों पर बात करें। मुद्दा स्कूल यूनिफॉर्म का है और कुछ नहीं।

पत्रकारों को बिकाऊ कहने से पहले समाज अपना गिरेबान टटोले तो बेहतर होगा 

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पत्रकार वो है जो समाज मे देखता है , अनुभव करता है अपने ज्ञान के आधार पर उसका विश्लेषण करता है , फिर उसे सार्वजनिक मंच पर लाता है इस प्रकिया में जन उपयोगी मुद्दो को उभारने में उसकी सक्रीय भूमिका होनी चाहिये । गण और तंत्र के बीच सवांद की कड़ी है पत्रकार । लेकिन इस प्रक्रिया मे उसे रोचकता लानी पड़ती है और ये रोचकता वैध तरीके से नही आती है क्योकि इसके लिये पर्याप्त रचनात्मकता चाहिये जो अधिक मेहनत और कुशल लेखको का काम है, लेकिन कुकरमुत्तो की तरह उग आई 'पत्रकारिता की डिग्रियो की दुकाने " किसी को भी डिग्री तो दे दे्ती है लेकिन उसे पत्रकार नही बनाती ' ये डिग्रीधारी पढा लिखा आदमी समाज और व्यवस्था की समझ भी विकसित नही कर पाता ना उसे लेखन और साहित्य की समझ होती है।

समाज में अब हर काम के लिये शार्टकट तरीके ' अपनाने का चलन है, फिर चाहे वो अनुचित ही क्यो ना हो। अब मौलिक लेखन /साहित्य आदि के प्रति जनरुझान न के बराबर होता है फिर  खब मे रोचकता लाने के लिये आसान विकल्प अपनाया जाता है , आटे मे नमक के तौर पर हास्य/ग्लैमर /सनसनी का प्रयोग किया जाता है , धीरे धीरे ये 'नमक' का स्वाद ' नमकीन' होकर लोगो को इतना भाता है कि मूल खबर लापता हो जाती है , फिर खबर के ये  ' सह उत्पाद' ही ' मूल उत्पाद' की शक्ल लेने लगते है , और वर्तमान में यही हो रहा है।

लोगो को 'सनसनी' पसन्द है तो पत्रकार उसे ही परोसने दौड़ता है क्योकि अगर पत्रकार दिन भर ये दिखाता रहे ' देखो ये हो रहा है" यहां गलत हुआ है , अपराध हुआ है सरकार को ऐसा करना चाहिये " किसान गरीब /मजदूर / आदिवासी पर जुल्म , हिंसा /अपराध/ बलात्कार फलां फला तो आप उठकर टीवी बन्द कर दोगे और अखबार फेंक दोगे क्योकि आपको दर्द हुआ , बैचेनी हुई समाज में ये क्या हो रहा है , आप झुझलाहट से भर जाते है , फिर आपको 'मजा' चाहिये , खबर में भी 'आनन्द चाहिये ' आप खबर ग्लैमर/हास्य/सनसनी वाले 'सह उत्पाद' को ही 'मूल उत्पाद' बना देते हो ।

इन्हे ही बेचकर पत्रकार और मीडिया हाउस इन्हे ही बेचकर पैसे कमाने लग जाते है, इस प्रक्रिया मे लोग भी खुश और मीडिया भी खुश। क्योकि खबर अब समाज में विचार करने का प्रश्न नही 'रोचकता ' और' मनोरजंन की विषय वस्तु हो गई है।
एक बड़ा कारण प्रचार माध्यमों को 'खबरे दिखाने के अतिरिक्त' विभिन्न कम्पनियो और मनोरजंन के 'उत्पाद' का भी विज्ञापन करना होता है।
ये 'आनन्ददायक' विज्ञापन ' खबरो की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करते है।

पत्रकार क्यो अपने पेशे भटक जाता है:…

" ये दुनिया बड़ी जालिम है सत्य का तलबगार नही कोई " शुरुआत में सब सत्य लिखते है कोशिश करते है समाज के अप्रिय सत्य को उजागर करने की परन्तु जड़ समाज और संवेदनहीन तंत्र का तीव्र प्रतिकार होता है। आय के जरिये सीमित हो जाते है , ऐसे में टिके रहना अक्सर मुश्किल होता है । फिर ' मीडिया मुगलो' की गुलामी और 'मनसबदारी" का लालच।
कुल मिलाकर हम ये कह सकते है कि ' पत्रकारों को बिकाऊ कहने से पहले समाज अपना गिरेबान टटोले तो बेहतर होगा कि क्यो पत्रकारिता के मूल्य समझने वाला ईमानदार पत्रकार दर दर मारा फिरता है "

क्या योगी आदित्यनाथ दोबारा संभालेंगे सत्ता की बागडोर?

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उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में पहले चरण के लिए वोटिंग का वक्त नजदीक आ गया है। तमाम राजनीतिक दलों ने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। चुनाव में वोट की खातिर जाति, धर्म, किसान, महंगाई, बेरोजगारी…जैसे मुद्दे उछाले जा रहे हैं। भाजपा भी दोबारा सत्ता में आने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। भाजपा दोबारा सत्ता में आएगी या नहीं, यह तो आगामी 10 मार्च को पता चलेगा, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि भाजपा सत्ता में वापसी करती है, तो क्या योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे? राजनीति के जानकार कहते हैं, दिल्ली की सत्ता sampadkiy 1का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है और लखनऊ को जीते बिना दिल्ली को जीतना मुमकिन नहीं है। ऐसे में समाजवादी पार्टी हो, बसपा हो या कांग्रेस हो, इनका सत्ता में आना तभी संभव है, जब ये चुनाव में एकतरफा जीत हासिल करें। यदि भाजपा और अन्य किसी विपक्षी दल के बीच हार-जीत का अंतर कम रहता है, तो भाजपा आसानी से सत्ता नहीं छोड़ेगी। वह वोट काउंटिंग में खेल करके या अन्य दलों में तोड़-फोड़ करके हर हाल में सत्ता पर काबिज करने की कोशिश करेगी, क्योंकि उसे सवा दो साल बाद दिल्ली में भी वापसी करना है।

लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए सेमी-फायनल

भाजपा यह भलीभांति जानती है कि उत्तरप्रदेश हाथ से जाता है, तो आने वाले समय में गुजरात, मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्यों में जहां विधानसभा चुनाव होना है, उसके लिए मुश्किल खड़ी होगी और इसका सीधा असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। कुल मिलाकर उत्तरप्रदेश चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए सेमी-फायनल कह तरह है। जिस तरह सपा मुखिया अखिलेश यादव ने चुनावी बिसात बिछाई है, उससे पार पाना भाजपा के लिए आसान नहीं है। यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के बाद भाजपा पहली पार्टी होगी, जो पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी करेगी।

योगी आदित्यनाथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली पसंद

बहस का मुद्दा यह भी है कि क्या सत्ता में आने पर भाजपा योगी आदित्यनाथ के हाथ में फिर से उत्तरप्रदेश की कमान सौंपेगी या फिर उन्हें गोरखपुर में बैठाकर लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किसी ओबीसी नेता को राज्य की बागडोर सौंपेगी। योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगते रहे हैं कि वे ठाकुरों की राजनीति करते हैं, इसलिए उनसे ब्राम्हण, ओबीसी और दलित वर्ग के लोग नाराज हैं। देश में योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं, मुख्यमंत्री रहते हुए वे जिस बेबाकी से हिंदुओं के समर्थन में और मुस्लिम विरोधी बयान देते रहे हैं, इससे उनकी छवि कट््टर हिंदू नेता की बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अन्य कोई भाजपा नेता मुख्यमंत्री रहते योगी की तरह दमदारी से हिंदुत्व का खुला समर्थन नहीं कर पाया। यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली पसंद बन गए हैं।

प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार

यदि योगी दोबारा मुख्यमंत्री बनते हैं, तो प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हो जाएंगे। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नहीं चाहेंगे कि योगी आदित्यनाथ को दूसरी बार सत्ता की कमान सौंपी जाए, लेकिन योगी भी कम नहीं हैं। पिछली बार भी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं था, लेकिन योगी की जिद और आरएसएस के दबाव में आकर आनन-फानन में योगी को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया था। गौर करने वाली बात यह है कि योगी आदित्यनाथ ने भी मुख्यमंत्री रहते तमाम फैसले अपनी मर्जी से और दमदारी से लिए। कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वे प्रधानमंत्री मोदी के दबाव में हों या उनके आगे झुके हों। ऐसे में यदि भाजपा चुनाव में बहुमत हासिल करती है, तो योगी को किनारे करना आसान नहीं होगा। और यदि भाजपा ऐसा करती है, तो पार्टी के अंदर 'महाभारत' छिड़ सकती है। वर्ष 2017 में जब योगी पहली बार सीएम बने थे, तब वे सिर्फ सांसद थे। इसके बाद भी बड़ी संख्या में उन्हें भाजपा विधायकों का समर्थन था। चूंकि अब वे पांच साल मुख्यमंत्री रहे हैं, इसलिए इस बात को सहज ही समझा जा सकता है कि बहुत से विधायक ऐसे होंगे, जो आंख मूंदकर योगी का समर्थन करेंगे। भाजपा के सत्ता में आने पर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं, यह आने वाला वक्त बताएगा।

नवजोत सिंह सिद्धू के अरमानों पर फिरा पानी, अब क्या गुल खिलाएंगे?

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पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को जिस बात का डर था, वही हुआ। पार्टी ने सिद्धू के अरमानों पर पानी फेर दिया। वे पार्टी नेतृत्व पर लगातार दबाव बना रहे थे कि वह पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री चेहरा घोषित कर दे। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने रविवार को सिद्धू की इच्छा पूरी कर दी। उन्होंने चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए सीएम चेहरा घोषित कर सिद्धू को जोर का झटका दे दिया। सिद्धू लगातार सीएम चेहरे पर दावा ठोक रहे थे। हाल में अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटवाने में सिद्धू की महत्वपूर्ण भूमिका थी। तब सिद्धू को उम्मीद थी कि इसके बदले में पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद की सौगात देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमरिंदर सिंह sampadkiy 1के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री के पद पर दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी की ताजपोशी कर दी गई। सिद्धू ने खुले तौर पर तो इसका विरोध नहीं किया, लेकिन उस वक्त भी उनके क्रियाकलापों को देखकर यह आसानी से समझा जा सकता था कि वे पार्टी के इस फैसले से खुश नहीं हैं। उन्होंने कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से चन्नी को कमतर बताने की कोशिश की, लेकिन चन्नी शांत रहे। सिद्धू चन्नी को अनाड़ी समझ रहे थे, लेकिन वे सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी निकले। मुख्यमंत्री के छोटे से कार्यकाल में उनके द्वारा जनता के हित में किए गए फैसलों से पंजाब में उनकी लोकप्रियता बढ़ गई। वे कहीं भी काफिला रोककर जनता के बीच पहुंच जाते, जिससे उनकी इमेज आम आदमी के मुख्यमंत्री की बन गई। पार्टी हाईकमान को भी चन्नी की सियासत का यह अंदाज खूब रास आया। चन्नी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर घबराए बड़बोले सिद्धू ने पार्टी हाईकमान को इस्तीफा भेज दिया, लेकिन पार्टी हाईकमान ने उन्हें मना लिया। तब सिद्धू ने दिल पर पत्थर रख लिया। उन्हें आस थी कि विधानसभा चुनाव के बाद तो पार्टी उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाएगी, लेकिन जब पार्टी ने सीएम चेहरा घोषित नहीं किया, तो सिद्धू की बेचैनी बढऩे लगी। सिद्धू अति महत्वाकांक्षी हैं और मुख्यमंत्री बनने का सपना लेकर ही भाजपा जैसी बड़ी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आए थे, लेकिन पार्टी ने चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम चेहरा घोषित कर सिद्धू के अरमानों पर पानी फेर दिया है। सिद्धू का बड़बोलापन ही उनकी कमजोरी बन गया है, जबकि चन्नी सधा हुए बोलते हैं। कांगे्रस सिद्धू की अति महत्वाकांक्षा से परिचित है और यह भी जानती है कि भविष्य में वे कभी भी पार्टी को झटका दे सकते हैं। कांग्रेस को चन्नी को सीएम चेहरा घोषित करने का सबसे बड़ा फायदा दलित वोट के रूप में मिलने की संभावना है। पंजाब में दलितों के लिए 34 सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा कई डेरे भी चन्नी का समर्थन कर रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस ने सिद्धू के स्थान पर चन्नी पर दांव लगाया है। हालांकि कांग्रेस पार्टी अच्छे से जानती है कि सिद्धू चुप रहने वाले नहीं हैं। चूंकि अभी वे मंझधार में हैं, इसलिए भले शांत रहें, लेकिन विधानसभा चुनाव में यदि कांग्रेस को बहुमत मिलता है, तो सिद्धू चन्नी के सीएम बनने की राह में बाधा जरूर बनेंगे। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सिद्धू इसके बाद क्या कहते हैं और कौन सा कदम उठाते हैं।

कर्मचारियों को तारीख नहीं पदोन्नति चाहिए सरकार

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मध्य प्रदेश में पिछले साढ़े पांच साल से सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों के प्रमोशन पर रोक लगी है और रोक की वजह भी शिवराज सरकार ही है। जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ न सरकार सुप्रीम कोर्ट जाती और न ही कर्मचारियों का प्रमोशन रुकता। पदोन्नति पर लगी रोक से कर्मचारियों की नारागजी को देखते हुए सरकार ने बीच का रास्ता निकालने की तैयारी की और तकरीबन साल भर पहले उन्हें पात्रतानुसार पदोन्नति देने का फैसला कर लिया। कर्मचारियों को पात्रतानुसार पदोन्नति देने की रणनीति तैयार करने गत सितंबर में मंत्री समूह का गठन किया गया, लेकिन मंत्री समूह भी sampadkiy 1इस बारे में कोई फैसला नहीं कर पा रहा है। गठन के बाद पांच महीने में मंत्री समूह एक दर्जन बैठकें कर चुका है, लेकिन हर बार नतीजा सिफर रहा। इस बारे में फैसला अगली बैठक में करने की बात कहकर मंत्री समूह बैठक की अगली तारीख तय कर देता है। इस सिलसिले में मंत्री समूह 8 फरवरी को अगली बैठक करेगा। मंत्री समूह में गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट, वन मंत्री विजय शाह, सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया और स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री इंदर सिंह परमार शामिल हैं।

साढ़े पांच साल से पदोन्नति पर लगी है रोक

साढ़े पांच साल से पदोन्नति पर रोक लगी होने से प्रदेश भर के कर्मचारियों में निराशा का माहौल तो है ही, उनमें सरकार के प्रति नाराजगी भी है। पदोन्नति में रोक लगी होने से हर महीने कर्मचारी बगैर प्रमोशन के सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सरकार की ओर से बनाए गए मंत्री समूह से कर्मचारियों को बड़ी उम्मीद थी। जब-जब मंत्री समूह की बैठकें होती हैं, तो कर्मचारियों को आस बंधती है कि पदोन्नति को लेकर कोई निर्णय लिया जाएगा, लेकिन अब मंत्री समूह से भी उनका भरोसा उठता जा रहा है। हालांकि पदोन्नति पर लगी रोक से कर्मचारियों की नाराजगी से सरकार अच्छे से वाकिफ है, लेकिन कर्मचारियों को पात्रतानुसार पदोन्नति कैसे दी जाए, मंत्री समूह इसका कोई फार्मूला तैयार नहीं कर पा रहा है। यही वजह है कि हर बार बैठकें टाल दी जाती है। अब मंत्री समूह अजाक्स और सपाक्स के प्रतिनिधियों से चर्चा करने की बात कह रहा है, जबकि इससे पहले भी मंत्री समूह सपाक्स और अजाक्स के प्रतिनिधियों को दो बैठकों में बुलाकर उनकी राय ले चुका है।  कर्मचारियों को पात्रतानुसार पदोन्नति कब तक मिलेगी, यह सरकार के अलावा कोई नहीं जानता।

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अधिकारी-कर्मचारी पदोन्नति के बिना ही सेवानिवृत्त

दरअसल, मप्र हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर ने 30 अप्रैल, 2016 को मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) अधिनियम-2002 खारिज कर दिया था। इस कानून में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने का प्रावधान है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद से प्रदेश में कर्मचारियों की पदोन्नति पर रोक लगी है। तब से अब तक 55 हजार से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इनमें कई ऐसे अधिकारी-कर्मचारी हैं, जो पदोन्नति के बिना ही सेवानिवृत्त हो गए। तभी से कर्मचारी संगठन सरकार से पदोन्नति देने की मांग कर रहे हैं।

सरकार ने अधिकारी-कर्मचारियों को उच्च पद का प्रभार देकर पदनाम दिए जाने को लेकर दिसंबर, 2020 में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। कमेटी ने कर्मचारियों को उच्च पद का प्रभार देने के संबंध में जनवरी, 2021 में शासन को अनुशंसा संबंधी रिपोर्ट सौंप दी थी। इसके बाद अब तक सरकार कर्मचारियों को उच्च पदों का प्रभार सौंपे जाने के संबंध में फैसला नहीं कर पाई है।

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नाकाम हो रही शिवराज सरकार, चुनाव में जाति-धर्म बनेगा हथियार?

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इस समय पूरे देश में उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव की चर्चा है, राजनीति में रुचि रखने वालों की सबसे ज्यादा रुचि उत्तरप्रदेश चुनाव में है। भाजपा अपनी रणनीति के तहत उप्र चुनाव को 'हिंदू-मुस्लिम' करने की  पुरजोर कोशिश कर रही है। वह इसमें कितनी सफल हो पाएगी, यह आने वाले वक्त में पता चलेगा। मध्यप्रदेश की बात करें, तो यहां सामान्यत: चुनाव जाति, धर्म का फैक्टर काम नहीं करता, लेकिन लगता है कि मप्र के आगामी विधानसभा चुनाव में धर्म sampadkiy 1को मुद्दा बना सकती है। सरकार के कुछ फैसलों और भाजपा नेताओं के बयानों से इस बात को भली-भांति समझा जा सकता है। कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त कर 'बैक डोर' के जरिए सत्ता में आई भाजपा का यह कार्यकाल अब तक नीरस रहा है। या यूं कहें कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने चौथे कार्यकाल में निष्प्रभावी होते नजर आ रहे हैं। इस कार्यकाल में वे बड़ी-बड़ी बातों के अलावा एक भी ऐसा काम नहीं कर पाए, जिसे वे प्रदेश की जनता के समक्ष उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद उनका आधा समय और आधी ऊर्जा कोरोना से निपटने में लग गई है।

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'स्वर्णिम मध्यप्रदेश' से 'आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश'

सरकार की नाकामी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने सबसे बड़े किसान वोट बैंक को पर्याप्त खाद तक उपलब्ध नहीं करा पाई है। आज भी किसान यूरिया के लिए परेशान हैं। सत्ता में आने के बाद शिवराज 'आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश' बनाने की बातें कर रहे हैं, अफसरों पर दबाव बना रहे हैं, लेकित अब तक इस दिशा में सरकार कोई खास कार्य नहीं कर पाई है। अपने पिछले कार्यकाल में  शिवराज प्रदेश को 'स्वर्णिम मध्यप्रदेश' बनाने की जिद ठाने हुए थे, लेकिन जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया था और उनका प्रदेश को स्वर्णिम बनाने का सपना पूरा नहीं हो पाया। अपने इसी सपने को उन्होंने चौथे कार्यकाल में आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का नाम दिया है।

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बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और रिश्वत

बेरोजगारी की वजह से युवा सरकार से बेहद खफा हैं। प्रदेश में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 35 लाख हो गई है। कोरोनाकाल में देश और प्रदेश के व्यापारियों की क्या हालत है, यह सभी जानते हैं। मुख्यमंत्री आए दिन भ्रष्ट अधिकारियों को चेतावनी दे रहे हैं, भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे। भ्रष्टाचार करने वालों को मैं नौकरी करने लायक नहीं छोड़ूगा। इसके बाद भी आए दिन लोकायुक्त संगठन और आर्थिक अपराध ब्यूरो की छापे की कार्रवाई में अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े जा रहे हैं और उनकी काली कमाई करोड़ों में है।

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क्‍या करें…. क्‍या न करें….

चूंकि इस कार्यकाल में  मुख्यमंत्री की चमक फीकी पड़ रही है, इसलिए भाजपा अगले चुनाव को जाति और धर्म की ओर मोडऩे की तैयारी में जुट गई है। इसी कड़ी में उत्तरप्रदेश की तर्ज पर मध्यप्रदेश में भी उन शहरों, स्थानों के नाम बदले जा रहे हैं, जो मुस्लिमों के नाम पर हैं। भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन और मिंटो हॉल का नाम बदलने के बाद अब होशंगाबाद और बाबई का नाम बदल दिया गया है। आने वाले दिनों में कुछ और शहरों के नाम बदले जाने के आसार हैं। उत्तरप्रदेश के काशी विश्वनाथ कॉरीडोर की तर्ज पर उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर को विकसित करने की तैयारी मप्र सरकार ने शुरू कर दी है। ऐसे ही मुख्यमंत्री से लेकर अन्य भाजपा नेता महात्मा गांधी से लेकर अन्य पुराने कांग्रेस नेताओं पर निशाना बनाया जा रहा है।

गणतंत्र दिवस पर दिए गए संदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि हमें कहते हुए कभी-कभी तकलीफ होती है कि स्वतंत्रता के बाद हमें आजादी का इतिहास तक गलत पढ़ाया गया। देश को बताया गया कि हिंदुस्तान को आजादी महात्मा गांधी, नेहरूजी, इंदिराजी ने दिलाई। आजादी की क्रांतिकारी धारा को भुला दिया गया, एक नहीं कई अमर शहीद क्रांतिकारियों की स्मृति को संजोकर नहीं रखा गया। ऐसे ही सरकार आगामी चुनाव में आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग को साधने के लिए अभी से तैयारियां कर रही है। कुल मिलाकर आगामी विधानसभा चुनाव में सरकार अपनी नाकामियां छुपाने के लिए जाति-धर्म को हथियार बनाकर मैदान में उतरेगी।

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दो साल से दस लाख कर्मचारियों को भरमा रही है शिवराज सरकार

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मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार पिछले दो साल से प्रदेश के 10 लाख कर्मचारियों को भरमा रही है। कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए कमलनाथ सरकार के समय बनाया गया कर्मचारी आयोग दो साल पहले भंग हो चुका है। आयोग में न अध्यक्ष है और न ही सदस्य हैं। इसके बाद भी सरकार आयोग का कार्यकाल बढ़ाती जा रही है। बिना sampadkiy 1अध्यक्ष और सदस्यों वाला आयोग कर्मचारियों की कितना भला कर पाएगा, यह तो सरकार ही जाने। कर्मचारियों को केंद्र के समान महंगाई भत्ता मिलने, साढ़े पांच साल से प्रमोशन पर लगी रोक हटने, संविदा कर्मचारियों को नियमितीकरण का बेसब्री से इंतजार है।

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कमलनाथ सरकार ने किया था कर्मचारी आयोग का गठन

दरअसल, कमलनाथ सरकार ने अपने वचन पत्र में किया गया वादा निभाते हुए 12 दिसंबर, 2019 को कर्मचारी आयोग का गठन किया था। सेवानिवृत्त आईएएस अजय नाथ को आयोग का चैयरमैन और वित्त विभाग के सेवानिवृत्त उप सचिव मिलिंद वाईकर को आयोग का सचिव बनाया गया था। इसके अलावा कर्मचारी नेता वीरेंद्र खोंगल, सेवािनवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश योगेश कुमार सोनगरिया, राच्य योजना आयोग के तत्कालीन सलाहकार अखिलेश अग्रवाल, जीएडी और वित्त विभाग के सचिव को सदस्य बनाया गया था। आयोग का कार्यकाल एक वर्ष रखा गया था। आयोग के दायरे में राज्य सरकार के अधिकारी-कर्मचारियों, निगम-मंडलों, अर्ध सरकारी संस्थाओं के मुलाजिमों के साथ संविदा कर्मचारी, अंशकालिक और पूर्णकालिक वेतन पाने वाले करीब 10 लाख कर्मचारियों को रखा गया था। आयोग के गठन का मकसद कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों समेत अन्य समस्याओं का अध्ययन कर आवश्यक सुझाव सरकार को देना था। आयोग ने गठन के बाद विभिन्न मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर उनकी समस्याएं सुनकर प्रतिवेदन तैयार किया था। यह सिफारिशें राज्य शासन को सौंपने से पूर्व ही आयोग का कार्यकाल पूरा हो गया और सिफारिशें ठंडे बस्ते में चली गईं। सरकार ने पहली बार दिसंबर, 2020 में आयोग का कार्यकाल एक साल बढ़ाने के संबंध में आदेश जारी किए, लेकिन आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल 11 दिसंबर, 2020 तक ही रखा गया और उस समय कहा गया था कि आयोग के पुनर्गठन और अध्यक्ष व सदस्यों के नए मनोनयन की कार्रवाई अलग से की जाएगी। साल भर से ज्यादा बीत जाने के बाद भी सरकार आयोग का पुनर्गठन नहीं कर पाई, जबकि हाल में सरकार ने फिर से आदेश जारी कर आयोग का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया है। अब आयोग का कार्यकाल 11 दिसंबर, 2022 को पूरा होगा।

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कर्मचारियों को भ्रम में रखे हुए है सरकार

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार कर्मचारी आयोग का कार्यकाल बढ़ाकर कर्मचारियों को भ्रम में रखे हुए हैं, क्योंकि बिना अध्यक्ष और सदस्यों के कर्मचारी आयोग औचित्यहीन है। सरकार को आयोग का तत्काल पुनर्गठन कर आयोग की ओर से तैयार किए गए प्रतिवेदन पर कार्रवाई करना चाहिए। कर्मचारी आयोग के पूर्व सदस्य  वीरेंद्र खोगल का कहना है कि आयोग ने करीब 80 मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारियों की समस्याएं सुनकर प्रतिवेदन तैयार किया था। कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण संबंधी सिफारिशें सरकार को सौंपने से पहले ही आयोग का कार्यकाल समाप्त हो गया। राज्य कर्मचारी कल्याण समिति के पूर्व सदस्य शिवपाल सिंह का कहना है कि विभिन्न विभाग कर्मचारियों की समस्याओं संबंधी रिपोर्ट कर्मचारी आयोग को भेज चुके हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। आयोग का पुनर्गठन किए बगैर उसका कार्यकाल बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है। सरकार आयोग का पुनर्गठन जल्द करे, ताकि कर्मचारियों की समस्याओं का निराकरण हो सके।

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भाजपा की राह चली कांग्रेस…

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मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव  भले ही 18 महीने दूर हों, लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने जमीन पर इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं। भाजपा संगठन तो हालांकि साल भर कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित कर पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सांस लेने का मौका नहीं देती, लेकिन आमतौर पर कांग्रेस चुनाव के चंद महीने पहले ही सक्रिय होती है। हालांकि कांग्रेस में इस बार हालात बदले बदले नजर आ रहे हैं। भाजपा गत 20 जनवरी से बूथ विस्तारक अभियान के जरिए हर बूथ पर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रही है, वहीं कांग्रेस भी इसके जबाव में 1 फरवरी से घर चलो, घर-घर चलो अभियान शुरू कर रही है। इस अभियान की रूपरेखा खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की देखरेख में तैयार हुई है। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के इस अभियान बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें sampadkiy 1कोई संदेह नहीं की संगठनात्मक रूप से भाजपा प्रदेश में कांग्रेस से ज्यादा सक्रिय रहती है। इसका बड़ा कारण उनका कैडर भी है, जो निरंतर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के फीडबैक पर संगठन विस्तार के लिए अभियान चलाता रहता है। कांग्रेस ने भी पिछले कुछ वर्षों से भाजपा की तर्ज पर संगठन को मजबूत करने का अभियान शुरू किया है। कमलनाथ ने पिछले विधानसभा चुनाव के पहले इसकी शुरुआत की थी। लीडरबेस कांग्रेस में जिस तरह संगठन की बारीकियों पर अब ध्यान दिया जा रहा है, इससे पहले शायद कभी नहीं दिया गया। मंडलम्, सेक्टर का गठन इसका बड़ा उदाहरण है।

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बूथ विस्तारक के जवाब में घर-घर चलो

घर चलो घर-घर चलो अभियान के तहत पांच से सात लोगों की टोली बनाई जा रही हैं। ये टोलियां अपने साथ मतदाता सूची लेकर चलेंगी। जिस घर में यह टोली जाएगी, वहां उस घर के व्यक्तियों का नाम मतदाता सूचियों से मिलाया जाएगा, अगर किसी का नाम नहीं है, तो उससे मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का निवेदन किया जाएगा। इसके अलावा पार्टी कार्यकर्ता एक और पेपर अपने हाथ में रखेंगे। इसमें केन्द्र और राज्य सरकार की विफलताओं का लेखा-जोखा होगा। कांग्रेस कार्यकर्ता लोगों को बताएंगे कि पिछले कुछ सालों में देश और प्रदेश में महंगाई किस तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा वे प्रदेश सरकार की अन्य विफलताओं को भी लोगों के बीच रखेंगे। कांग्रेस इस अभियान के महत्व को समझते हुए इसकी सतत् निगरानी करेगी, इसके लिए छह सदस्यों की कमेटी का गठन किया गया है। यह कमेटी देखेगी की किस जिले में, ब्लॉक में, मंडलम् में, सेक्टर में अभियान कितनी गंभीरता से चलाया जा रहा है या खानापूर्ति की जा रही है। अभियान औपचारिक बनकर न रह जाए, इसलिए पार्टी ने एक मॉनीटरिंग कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी पूरे समय अभियान की निगरानी करेगी। अभियान के दौरान सदस्यता पर भी फोकस रहेगा। आगामी विधानसभा चुनाव में संगठन के स्तर पर कांग्रेस भाजपा का कितना मुकाबला कर पाएगी, यह आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन कांग्रेस ने कम से कम कोशिश तो शुरू की है, कई बार कोशिशें कामयाब हो जाती हैं।

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उत्तरप्रदेश चुनाव: अखिलेश के सियासी चक्रव्यूह में उलझी भाजपा

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देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनावी रण शुरू हो चुका है। भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस समेत अन्य छोटे-छोटे सियासी दल चुनावी रण में ताल ठोक रहे हैं और अपने-अपने जीत के दावे कर रहे हैं, लेकिन चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा जिस पार्टी की है, वह है समाजवादी पार्टी। जिस खामोशी से सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनावी बिसात बिछाई है, उससे निपटने का विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा को उपाय नहीं सूझ रहा है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जिस जाट वोट बैंक को भाजपा अपना मानकर चल रही है, किसान आंदोलन की वजह से जाट भाजपा से sampadkiy 1छिटकते नजर आ रहे हैं। रही-सही कसर चौधरी चरण सिंह के पोते और अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी ने पूरी कर दी है। जयंत राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख हैं और इस वक्त पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसानों और जाटों में उनका खासा प्रभाव है। अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की पार्टियां गठबंधन कर चुनाव लड़ रही हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में जाट नेताओं के साथ बैठक कर जाट वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति तैयार की और जयंत चौधरी को भाजपा में आने का न्योता दिया, लेकिन जयंत चौधरी ने इसे पूरी तरह से ठुकरा दिया। अखिलेश यादव ने जहां पश्चिमी उप्र में भाजपा के गढ़ को भेदने के लिए जयंत चौधरी के साथ गठबंधन किया, वहीं वे हर सभा में तीनों कृषि कानूनों, आंदोलन में शहीद 700 से ज्यादा किसानों और गन्ना के भुगतान में देरी का जिक्र कर रहे हैं। साथ ही सभाओं में मंच से किसानों के कल्याण के लिए अन्न संकल्प ले रहे हैं, जिससे किसानों के बीच सपा और रालोद के प्रति सकारात्मक माहौल बन रहा है। पश्चिमी उप्र में विधानसभा की 136 सीटें हैं।

वहीं पूर्वी उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव ने ऐसा जातिगत चक्रव्यूह रचा है कि भाजपा को उसका तोड़ नहीं मिल रहा है। ओपी राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे बड़े जनाधार वाले नेताओं को भाजपा से तोड़कर सपा में शामिल कर अखिेलश यादव पिछड़ा वर्ग के बड़े वोट बैंक को एकजुट कर सपा के पाले में लाने में काफी हद तक सफल नजर आ रहे हैं। अखिलेश यादव योगी राज में पिछड़ों, दलितों पर अत्याचार, बेरोजगारी, किसानों की परेशानी, कोरोना काल में हुई मौतों आदि के मुद्दे उठाकर भाजपा को घेर रहे हैं। दरअसल, भाजपा ने अब से साल भर पहले तक सपा की निष्क्रियता को देखकर मान लिया था कि उसके सामने 2022 में कोई चुनौती नहीं है। उसे राम मंदिर, काशी विश्वनाथ और मथुरा मंदिर के मुद्दे पर चुनाव में ध्रुवीकरण होने की पूरी उम्मीद थी। साथ ही पश्चिमी उप्र में उसे जाटों से आस थी, लेकिन जिस तरह से अखिलेश यादव ने पिछले छह महीने में जिस चतुराई से प्रदेश में चुनावी बिसात बिछाई है, उससे भाजपा सकते में है। अमित शाह से लेकर तमाम भाजपा नेता अब चुनाव को हिंदू-मुस्लिम करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक भाजपा को इसमें सफलता नहीं मिली है।

हालांकि यह कहना मुश्किल है कि चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, लेकिन अखिलेश यादव की चुनावी चालों ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भाजपा के तमाम आला नेताओं की नींद उड़ा रखी है। यह वही भाजपा है, जिसके पास लोकसभा में 300 से ज्यादा सीटें, उप्र विधानसभा में 300 से ज्यादा सीटें, करीब 20 राज्यों में सरकार है, जिसके हाथ में ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स विभाग है, जिसके पास आरएसएस जैसे निष्ठावान कार्यकर्ता हैं, वह भाजपा उस सपा से परेशान है, जिसकी उप्र विधानसभा में 47 सीटें हैं, लोकसभा में 5 सीटें है, किसी राज्य में सरकार नहीं है और जिसके पास एकमात्र अखिलेश यादव नेता हैं। कुल मिलाकर उप्र की चुनावी महाभारत में अखिलेश यादव अभिमन्यु की भूमिका हैं और भाजपा कौरवों की भूमिका में। उप्र का चुनाव परिणाम क्या होगा, यह 10 मार्च को सामने आएगा, लेकिन अखिलेश की सियासी चाल ने चुनाव में रोचक बना दिया है।

क्या गुल खिलाएगी कमलनाथ-दिग्विजय की ‘अदावत’?

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अब से करीब सवा तीन साल पहले जब कांग्रेस 15 साल का वनवास पूरा कर सत्ता में आई थी, तो इसमें तीन किरदारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरािदत्य सिंधिया। तीनों ने एकजुट होकर विधानसभा चुनाव लड़ा और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई। कमलनाथ को प्रदेश की कमान सौंप दी गई। कमलनाथ मुख्यमंत्री थे, लेकिन कहा जाता था कि सरकार का रिमोट कंट्रोल दिग्विजय सिंह के पास है। तमाम की-पोस्ट पर दिग्विजय सिंह के sampadkiy 1विश्वस्त अफसर बैठे थे। सत्ता में आने के करीब 15 महीने बाद ज्योतिरािदत्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ी और कमलनाथ सीधे सत्ता से सड़क पर आ गए। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि दिग्विजय सिंह की वजह से सिंधिया कांग्रेस छोडऩे को मजबूर हुए थे। अब कांग्रेस में दो चेहरे बचे हैं-प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच 'तल्ख' संवाद

कांग्रेसियों को उम्मीद है कि ये दोनों मिलकर 2023 में फिर से कांग्रेस की सत्ता में वापसी करवाएंगे, लेकिन गत 21 जनवरी को धरने के दौरान सड़क पर जिस तरह कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच 'तल्ख' संवाद हुआ, उससे यह स्पष्ट हो गया कि इन दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उनके बीच अदावत की इस आहट से कांग्रेसी सदमे में हैं। जिन दो वरिष्ठ नेताओं के भरोसे में पौने दो साल बाद सत्ता में वापसी की बाट जोह रहे हैं, यदि उनके बीच ही रिश्ते मधुर नहीं रहे तो कांग्रेस नेताओं का भविष्य क्या होगा? दरअसल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर मिलने के लिए समय नहीं देने का आरोप लगाते हुए दिग्विजय सिंह 21 जनवरी को सीएम हाउस के नजदीक सड़क पर धरने पर बैठ गए। दिग्विजय जब सड़क पर बैठे थे, तब कमलनाथ भी उनसे मिलने पहुंच गए। वे भी उनके साथ सड़क पर बैठ गए। इसी दौरान उन्होंने दिग्विजय से पूछा कि चार दिन पहले तो मैं यहीं था, मुझे इस कार्यक्रम के बारे में बताया तक नही गया। इस पर बगल में बैठे दिग्विजय ने कहा कि क्या मैं आप से पूछकर मुख्यमंत्री से मिलने का समय लूंगा? इस पर कमलनाथ ने कहा कि देट इज गुड और चंद सेकंड बाद ही वे वहां से उठकर चले गए। उनके बीच सड़क पर हुए इस संवाद का वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। बीजेपी भी उन दोनों के बीच हुए इस संवाद को लेकर कांग्रेस पर तंज कसने का मौका नहीं छोड़ रही है। यह भी संयोग है कि जिस समय दिग्विजय धरने पर बैठे थे, ठीक उसी समय कमलनाथ और सीएम शिवराज स्टेट हैंगर पर आपस में बात कर रहे थे। शिवराज से मिलने के बाद ही कमलनाथ दिग्विजय के धरने में पहुंचे थे। कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा वर्ग यह मान रहा है कि दिग्विजय सिंह अपनी लाइन बड़ी करना चाहते हैं। यही वजह है कि वे आए दिन बयानबाजी और ट्वीट के जरिए आरएसएस, भाजपा पर हमला करते रहते हैं, जिसका खमियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ रहा है।

पार्टी में अराजकता

दिग्विजय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और केंद्रीय महासचिव रहे हैं। फिलहाल वे राज्यसभा सदस्य हैं। उन्हें पार्टी के नियमों की भलीभांति जानकारी है। उन्हें यह साफ करना चाहिए कि क्या वे निजी हैसियत से मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे या फिर राच्यसभा सदस्य और पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से। अगर यह उनका निजी कार्यक्रम था, तो कोई बात नहीं। अगर ऐसा नहीं, तो उन्हें पीसीसी चीफ को इस बारे में सूचित तो करना ही चाहिए था। अगर पार्टी नेता उनका अनुसरण करने लगेंगे, तो फिर पार्टी में अराजकता फैल जाएगी। कोई किसी की न सुनेगा, न मानेगा। कांगे्रसी मानते हैं कि मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ भरम में रहे। दिग्विजय को अपना सबसे पुराना और करीबी साथी बताकर उन पर आंख मूंदकर विश्वास जताते रहे। कमलनाथ यह भूल गए थे कि इन्हीं दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुन सिंह को प्रदेश में राजनीतिक हाशिये पर पहुंचा दिया था। वे उनके सगे कैसे हो सकते हैं। उधर दिग्विजय ने अपना कमाल दिखा दिया। उन्होंने अपने बेटे जयवद्र्धन सिंह की राजनीति चमकाने के लिए ऐसी कुटिल चाल चली कि ज्योतिरादित्य पार्टी छोडऩे पर मजबूर हो गए और कमलनाथ सड़क पर आ गए।

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दरार भरेगी या और गहरी होगी

दिग्विजय की राजनीति पर पिछले चार दशक से गहरी नजर रखने वाले एक पुराने कांग्रेस नेता की राय में-दिग्विजय इन दिनों तडफ़ रहे हैं। दिल्ली उन्हें पूछ नही रही है। जिस उत्तरप्रदेश के प्रभारी रहे हैं, उसमें चुनाव प्रचार का चेहरा भी नही बनाया है। 10 जनपथ और 24 अकबर रोड के कपाट उनके लिए खुल नही रहे हैं, तो फिर वे क्या करें? दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के बीच आई दरार भरेगी या और गहरी होगी और आने वाले विधानसभा चुनाव पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की अदावत से फिलहाल कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता परेशान हैं।

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